Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 25

99 Mantra
17/25
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- भुवनपुत्रो विश्वकर्मा ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
चक्षु॑षः पि॒ता मन॑सा॒ हि धीरो॑ घृ॒तमे॑नेऽअजन॒न्नम्न॑माने। य॒देदन्ता॒ऽअद॑दृहन्त॒ पूर्व॒ऽआदिद् द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॑प्रथेताम्॥२५॥

चक्षु॑षः। पि॒ता। मन॑सा। हि। धीरः॑। घृ॒तम्। ए॒न॒ऽइत्ये॑ने। अ॒ज॒न॒त्। नम्न॑माने॒ऽइति॒ नम्न॑माने। य॒दा। इत्। अन्ताः॑। अद॑दृहन्त। पूर्वें॑। आत्। इत्। द्यावा॑पृथि॒वी। अ॒प्र॒थे॒ता॒म् ॥२५ ॥

Mantra without Swara
चक्षुषः पिता मनसा हि धीरो घृतमेनेऽअजनन्नम्नमाने । यदेदन्ताऽअददृहन्त पूर्वऽआदिद्द्यावापृथिवीऽअप्रथेताम् ॥

चक्षुषः। पिता। मनसा। हि। धीरः। घृतम्। एनऽइत्येने। अजनत्। नम्नमानेऽइति नम्नमाने। यदा। इत्। अन्ताः। अददृहन्त। पूर्वें। आत्। इत्। द्यावापृथिवी। अप्रथेताम्॥२५॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे प्रजा के पुरुषो! आप लोग जो (चक्षुषः) न्याय दिखाने वाले उपदेशक का (पिता) रक्षक (मनसा) योगाभ्यास से शान्त अन्तःकरण (हि) ही से (धीरः) धीरजवान् (घृतम्) घी को (अजनत्) प्रकट करता है, उसको अधिकार देके (एने) राजा और प्रजा के दल (नम्नमाने) नम्न के तुल्य आचरण करते हुए (पूर्वे) पहिले से वर्त्तमान (द्यावापृथिवी) प्रकाश और पृथिवी के समान मिले हुए जैसे (अप्रथेताम्) प्रख्यात होवे, वैसे (इत्) ही (यदा) जब (अन्ताः) अन्त्य के अवयवों के तुल्य (अददृहन्त) वृद्धि को प्राप्त हों, तब (आत्) उसके पश्चात् (इत्) ही स्थिरराज्य वाले होओ॥२५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब मनुष्य राज और प्रजा के व्यवहार में एकसम्मति होकर सदा प्रयत्न करें, तभी सूर्य और पृथिवी के तुल्य स्थिर सुख वाले होवें॥२५॥
Subject
फिर भी उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥