Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 18

31 Mantra
14/18
Devata- छन्दांसि देवताः Rishi- विश्वदेव ऋषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
मा छन्दः॑ प्र॒मा छन्दः॑ प्रति॒मा छन्दो॑ऽ अस्री॒वय॒श्छन्दः॑ प॒ङ्क्तिश्छन्द॑ऽ उ॒ष्णिक् छन्दो॑ बृह॒ती छन्दो॑ऽनु॒ष्टुप् छन्दो॑ वि॒राट् छन्दो॑ गाय॒त्री छन्द॑स्त्रि॒ष्टुप् छन्दो॒ जग॑ती॒ छन्दः॑॥१८॥

मा। छन्दः॑। प्र॒मेति॑ प्र॒ऽमा। छन्दः॑। प्र॒ति॒मेति॑ प्रति॒ऽमा। छन्दः॑। अ॒स्री॒वयः॑। छन्दः॑। प॒ङ्क्तिः। छन्दः॑। उ॒ष्णिक्। छन्दः॑। बृ॒ह॒ती। छन्दः॑। अ॒नु॒ष्टुप्। अ॒नु॒स्तुबित्य॑नु॒ऽस्तुप्। छन्दः॑। वि॒राडिति॑ वि॒ऽराट्। छन्दः॑। गा॒य॒त्री। छन्दः॑। त्रि॒ष्टुप्। त्रि॒स्तुबिति॑ त्रि॒ऽस्तुप्। छन्दः॑। जग॑ती। छन्दः॑ ॥१८ ॥

Mantra without Swara
मा च्छन्दः प्रमा च्छन्दः प्रतिमा च्छन्दोऽअम्रीवयश्छन्दः पङ्क्तिश्छन्दऽउष्णिक्छन्दो बृहती छन्दोनुष्टुप्छन्दो विराट्छन्दो गायत्री छन्दस्त्रिष्टुप्छन्दो जगती च्छन्दः ॥

मा। छन्दः। प्रमेति प्रऽमा। छन्दः। प्रतिमेति प्रतिऽमा। छन्दः। अस्रीवयः। छन्दः। पङ्क्तिः। छन्दः। उष्णिक्। छन्दः। बृहती। छन्दः। अनुष्टुप्। अनुस्तुबित्यनुऽस्तुप्। छन्दः। विराडिति विऽराट्। छन्दः। गायत्री। छन्दः। त्रिष्टुप्। त्रिस्तुबिति त्रिऽस्तुप्। छन्दः। जगती। छन्दः॥१८॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो! तुम लोग (मा) परिमाण का हेतु (छन्दः) आनन्दकारक (प्रमा) प्रमाण का हेतु बुद्धि (छन्दः) बल (प्रतिमा) जिससे प्रतीति निश्चय की क्रिया हेतु (छन्दः) स्वतन्त्रता (अस्रीवयः) बल और कान्तिकारक अन्नादि पदार्थ (छन्दः) बलकारी विज्ञान (पङ्क्तिः) पांच अवयवों से युक्त योग (छन्दः) प्रकाश (उष्णिक्) स्नेह (छन्दः) प्रकाश (बृहती) बड़ी प्रकृति (छन्दः) आश्रय (अनुष्टुप्) सुखों का आलम्बन (छन्दः) भोग (विराट्) विविध प्रकार की विद्याओं का प्रकाश (छन्दः) विज्ञान (गायत्री) गाने वाले का रक्षक ईश्वर (छन्दः) उस का बोध (त्रिष्टुप्) तीन सुखों का आश्रय (छन्दः) आनन्द और (जगती) जिस में सब जगत् चलता है, उस (छन्दः) पराक्रम को ग्रहण कर और जान के सब को सुखयुक्त करो॥१८॥
Essence
जो मनुष्य निश्चय के हेतु आनन्द आदि से साध्य, धर्मयुक्त कर्मों को सिद्ध करते हैं, वे सुखों से शोभायमान होते हैं॥१८॥
Subject
स्त्री-पुरुषों को कैसे विज्ञान बढ़ाना चाहिये? इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥