Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 27

58 Mantra
13/27
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मधु॒ वाता॑ऽ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः। माध्वी॑र्नः स॒न्त्वोष॑धीः॥२७॥

मधु॑। वाताः॑। ऋ॒ता॒य॒ते। ऋ॒त॒य॒त इत्यृ॑तऽय॒ते। मधु॑। क्ष॒र॒न्ति॒। सिन्ध॑वः। माध्वीः॑। नः॒। स॒न्तु॒। ओष॑धीः ॥२७ ॥

Mantra without Swara
मधु वाताऽऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥

मधु। वाताः। ऋतायते। ऋतयत इत्यृतऽयते। मधु। क्षरन्ति। सिन्धवः। माध्वीः। नः। सन्तु। ओषधीः॥२७॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो! जैसे वसन्त ऋतु में (नः) हम लोगों के लिये (वातः) वायु (मधु) मधुरता के साथ (ऋतायते) जल के समान चलते हैं, (सिन्धवः) नदियां वा समुद्र (मधु) कोमलतापूर्वक (क्षरन्ति) वर्षते हैं और (ओषधीः) ओषधियां (माध्वीः) मधुर रस के गुणों से युक्त (सन्तु) होवें, वैसा प्रयत्न हम किया करें॥२७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब वसन्त ऋतु आता है, तब पुष्प आदि के सुगन्धों से युक्त वायु आदि पदार्थ होते हैं, उस ऋतु में घूमना-डोलना पथ्य होता है, ऐसा निश्चित जानना चाहिये॥२७॥
Subject
आगे के मन्त्र में वसन्त ऋतु के अन्य गुणों का वर्णन किया है॥