Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 27

83 Mantra
11/27
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने॒ द्युभि॒स्त्वमा॑शुशु॒क्षणि॒स्त्वम॒द्भ्यस्त्वमश्म॑न॒स्परि॑। त्वं वने॑भ्य॒स्त्वमोष॑धीभ्य॒स्त्वं नृ॒णां नृ॑पते जायसे॒ शुचिः॑॥२७॥

त्वम्। अ॒ग्ने॒। द्युभि॒रिति॒ द्युऽभिः॑। त्वम्। आ॒शु॒शु॒क्षणिः॑। त्वम्। अ॒द्भ्य इत्य॒त्ऽभ्यः। त्वम्। अश्म॑नः। परि॑। त्वम्। वने॑भ्यः। त्वम्। ओष॑धीभ्यः। त्वम्। नृ॒णाम्। नृ॒प॒त॒ इति॑ नृऽपते। जा॒य॒से॒। शुचिः॑ ॥२७ ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने द्युभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस्परि । त्वँवनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वन्नृणां नृपते जायसे शुचिः ॥

त्वम्। अग्ने। द्युभिरिति द्युऽभिः। त्वम्। आशुशुक्षणिः। त्वम्। अद्भ्य इत्यत्ऽभ्यः। त्वम्। अश्मनः। परि। त्वम्। वनेभ्यः। त्वम्। ओषधीभ्यः। त्वम्। नृणाम्। नृपत इति नृऽपते। जायसे। शुचिः॥२७॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे (नृपते) मनुष्यों के पालने हारे (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान न्यायाधीश राजन्! (त्वम्) आप (द्युभिः) दिनों के समान प्रकाशमान न्याय आदि गुणों से सूर्य्य के समान (त्वम्) आप (आशुशुक्षणिः) शीघ्र दुष्टों को मारने हारे (त्वम्) आप (अद्भ्यः) वायु वा जलों से (त्वम्) आप (अश्मनः) मेघ वा पाषाणादि से (त्वम्) आप (वनेभ्यः) जङ्गल वा किरणों से (त्वम्) आप (ओषधीभ्यः) सोमलता आदि ओषधियों से (त्वम्) आप (नृणाम्) मनुष्यों के बीच (शुचिः) पवित्र (परि) सब प्रकार (जायसे) प्रसिद्ध होते हो, इस कारण आप का आश्रय लेके हम लोग भी ऐसे ही होवें॥२७॥
Essence
जो राजा, सभासद् वा प्रजा का पुरुष सब पदार्थों से गुण ग्रहण और विद्या तथा क्रिया की कुशलता से उपकार ले सकता है और धर्म के आचरण से पवित्र तथा शीघ्रकारी होता है, वही सब सुखों को प्राप्त हो सकता है, अन्य आलसी पुरुष नहीं॥२७॥
Subject
फिर सभाध्यक्ष कैसा होना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥