Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 10

34 Mantra
10/10
Devata- यजमानो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- विराट् आर्षी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अवे॑ष्टा दन्द॒शूकाः॒ प्राची॒मारो॑ह गाय॒त्री त्वा॑वतु रथन्त॒रꣳ साम॑ त्रि॒वृत् स्तोमो॑ वस॒न्तऽऋ॒तुर्ब्रह्म॒ द्रवि॑णम्॥१०॥

अवे॑ष्टा॒ इत्यव॑ऽइष्टाः। द॒न्द॒शूकाः॑। प्राची॑म्। आ। रो॒ह॒। गा॒य॒त्री। त्वा॒। अ॒व॒तु॒। र॒थ॒न्त॒रमिति॑ रथम्ऽत॒रम्। साम॑। त्रि॒वृदिति॑ त्रि॒ऽवृत्। स्तोमः॑। व॒स॒न्तः। ऋ॒तुः। ब्रह्म॑। द्रवि॑णम् ॥१०॥

Mantra without Swara
अवेष्टा दन्दशूकाः प्राचीमारोह गायत्री त्वावतु रथन्तरँ साम त्रिवृत्स्तोमो वसन्तऽऋतुर्ब्रह्म द्रविणन्दक्षिणामा रोह ॥

अवेष्टा इत्यवऽइष्टाः। दन्दशूकाः। प्राचीम्। आ। रोह। गायत्री। त्वा। अवतु। रथन्तरमिति रथम्ऽतरम्। साम। त्रिवृदिति त्रिऽवृत्। स्तोमः। वसन्तः। ऋतुः। ब्रह्म। द्रविणम्॥१०॥

Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati)

हिन्दी
Yajurveda Bhashya (Swami Dayanand Saraswati) - हिन्दी
Meaning
हे राजन्! जो आप (अवेष्टाः) विरोधी का सङ्ग करने वाले (दन्दशूकाः) दूसरों को दुःख देने के लिये काट खाने वाले हैं, उनको जीत के (प्राचीम्) पूर्व दिशा में (आरोह) प्रसिद्ध हों, उस (त्वा) आप को (गायत्री) पढ़ा हुआ गायत्री छन्द (रथन्तरम्) रथों से जिसके पार हों, ऐसा वन (साम) सामवेद (त्रिवृत्) तीन मन, वाणी और शरीर के बलों का बोध कराने वाला (स्तोमः) स्तुति के योग्य (वसन्तः) वसन्त (ऋतुः) ऋतु (ब्रह्म) वेद, ईश्वर और ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणकुलरूप (द्रविणम्) धन (अवतु) प्राप्त होवे॥१०॥
Essence
जो मनुष्य विद्याओं में प्रसिद्ध होते हैं, वे शत्रुओं को जीत के ऐश्वर्य्य को प्राप्त हो सकते हैं॥१०॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करके किस-किस को प्राप्त हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥