Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 18

48 Mantra
7/18
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप्,प्राजापत्या गायत्री Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒प्र॒जाः प्र॒जाः प्र॑ज॒नय॒न् परी॑ह्य॒भि रा॒यस्पोषे॑ण॒ यज॑मानम्। स॒ञ्ज॒ग्मा॒नो दि॒वा पृ॑थि॒व्या म॒न्थी म॒न्थिशो॑चिषा॒ निर॑स्तो॒ मर्को॑ म॒न्थिनो॑ऽधि॒ष्ठान॑मसि॥१८॥

सु॒प्र॒जा इति॑ सुऽप्र॒जाः। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। प्र॒ज॒नयन्निति॑ प्रऽज॒नय॑न्। परि॑। इ॒हि॒। अ॒भि। रा॒यः। पोषे॑ण। यज॑मानम्। स॒ञ्ज॒ग्मा॒न इति॑ सम्ऽजग्मा॒नः। दि॒वा। पृ॒थि॒व्या। म॒न्थी। म॒न्थिशो॑चि॒षेति॑ म॒न्थिशो॑चिषा। निर॑स्त॒ इति॑ निःऽअ॑स्तः। मर्कः॑। म॒न्थिनः॑। अ॒धि॒ष्ठान॑म्। अ॒धि॒स्थान॒मित्य॑धि॒ऽस्थान॑म्। अ॒सि॒ ॥१८॥

Mantra without Swara
सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम् । सञ्जग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा निरस्तो मर्को मन्थिनो धिष्ठानमसि ॥

सुप्रजा इति सुऽप्रजाः। प्रजा इति प्रऽजाः। प्रजनयन्निति प्रऽजनयन्। परि। इहि। अभि। रायः। पोषेण। यजमानम्। सञ्जग्मान इति सम्ऽजग्मानः। दिवा। पृथिव्या। मन्थी। मन्थिशोचिषेति मन्थिशोचिषा। निरस्त इति निःऽअस्तः। मर्कः। मन्थिनः। अधिष्ठानम्। अधिस्थानमित्यधिऽस्थानम्। असि॥१८॥

Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

मराठी
Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar) - मराठी
Meaning
शब्दार्थ : हे न्यायाधीश, (सुप्रजा:) आपली प्रजा उत्तम असून आपण (प्रजा:) प्रजाजनांना (प्रजनयन्) जाणून घेत (राय:) धनाच्या (पोषेण) पुष्टी वा समृद्धीद्वारे (यजमानम्) दृढतेने वा निश्चयाने यज्ञ आदी उत्तम कर्म करणार्‍या व्यक्तीला (अभि) (परि) (इहि) सर्वदृष्ट्या अधिक धर्म संपन्न करा. (मन्थी) आपण राष्ट्रविवादाचे मंथन करून सत्य बाहेर काढणारे असून (दिवा) सूर्य व (पृथिन्या) पृथ्वीप्रमाणे (संजग्ममान:) धैर्याने वागणारे आहात. (मन्यिन:) सत्-असत् याचे विवेचन-विवेक करून योग्य गुणांना अधिष्ठानम्) स्थान वा आधार देणारे (असि) आहात. या आपल्या (मन्यिशोचिषा) सूर्याच्या दीप्तीप्रमाणे चकाकणार्‍या न्यायप्रियता गुणांमुळे (मर्स:) मृत्युदायक अन्यायीजनाचा (निरस्त:) नाश होवो वा तो आपल्या दुष्कर्मापासून निरस्त होवो( आपल्या न्यायभिष्ठरता गुणांमुळे अन्यायी व अपराधी जनांना अन्याय करण्याची हिंमतच होऊ नये) ॥18॥
Essence
भावार्थ - या मंत्रात उपमा अलंकार आहे. न्यायाधीश राजाचे कर्तव्य आहे की धर्माप्रमाणे यज्ञ करणार्‍या सत्पुरूष व पुरोहिताप्रमाणे आपल्या प्रजेचे सवैदव पालन-रक्षण करावे ॥18॥
Subject
न्यायाधीशाने प्रजाजनांशी कसे वागावे, पुढील मंत्रात हा विषय सांगितला आहे -