Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 18

28 Mantra
38/18
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- भुरिगाकृतिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
या ते॑ घर्म दि॒व्या शुग्या गा॑य॒त्र्या ह॑वि॒र्धाने॑।सा त॒ऽ आ प्या॑यता॒न्निष्ट्या॑यतां॒ तस्यै॑ ते॒ स्वाहा॑।या ते॑ घर्मा॒न्तरि॑क्षे॒ शुग्या त्रि॒ष्टुभ्याग्नी॑ध्रे।सा त॒ऽ आ प्या॑यता॒न्निष्ट्या॑यतां॒ तस्यै॑ ते॒ स्वाहा॑।या ते॑ घर्म पृथि॒व्या शुग्या जग॑त्या सद॒स्या।सा त॒ऽ आ प्या॑यता॒न्निष्ट्या॑यतां॒ तस्यै॑ ते॒ स्वाहा॑॥१८॥

या। ते॒। घ॒र्म॒। दि॒व्या। शुक्। या। गा॒य॒त्र्याम्। ह॒वि॒र्धान॒ इति॑ हविः॒ऽधाने॑। सा। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। निः। स्त्या॒य॒ता॒म्। तस्यै॑। ते॒। स्वाहा॑। या। ते॒। घ॒र्म॒। अ॒न्तरि॑क्षे। शुक्। या। त्रि॒ष्टुभि॑। त्रि॒स्तुभीति॑ त्रि॒ऽस्तुभि॑। आग्नी॑ध्रे ॥ सा। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। निः। स्त्या॒य॒ता॒म्। तस्यै॑। ते॒। स्वाहा॑। या। ते॒। घ॒र्म॒। पृ॒थि॒व्याम्। शुक्। या। जग॑त्याम्। स॒द॒स्या᳖। सा। ते॒। आ। प्या॒य॒ता॒म्। निः। स्त्या॒य॒ता॒म्। तस्यै॑। ते॒। स्वाहा॑ ॥१८ ॥

Mantra without Swara
या ते घर्म दिव्या शुग्या गायत्र्याँ हविर्धाने । सा तऽआ प्यायतान्निष्प्यायतान्तस्यै ते स्वाहा । या ते घर्मान्तरिक्षे शुग्या त्रिष्टुभ्याग्नीध्रे । सा तऽआ प्यायतान्निष्प्यायतान्तस्यै ते स्वाहा । या ते घर्म पृथिव्याँ शुग्या जगत्याँ सदस्या । सा तऽआ प्यायतान्निष्प्यायतान्तस्यै ते स्वाहा ॥

या। ते। घर्म। दिव्या। शुक्। या। गायत्र्याम्। हविर्धान इति हविःऽधाने। सा। ते। आ। प्यायताम्। निः। स्त्यायताम्। तस्यै। ते। स्वाहा। या। ते। घर्म। अन्तरिक्षे। शुक्। या। त्रिष्टुभि। त्रिस्तुभीति त्रिऽस्तुभि। आग्नीध्रे॥ सा। ते। आ। प्यायताम्। निः। स्त्यायताम्। तस्यै। ते। स्वाहा। या। ते। घर्म। पृथिव्याम्। शुक्। या। जगत्याम्। सदस्या। सा। ते। आ। प्यायताम्। निः। स्त्यायताम्। तस्यै। ते। स्वाहा॥१८॥

Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

मराठी
Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar) - मराठी
Meaning
शब्दार्थ - हे (घर्म) प्रकाशरूप विद्वान, अथवा हे विदुषी स्त्री, (हे) तुझ्याकडे (या) जी (गायत्र्याम्) अध्ययन वा रक्षक विद्येच्या आणि (हविर्धाने) होम हवनीय पदार्थांच्या धारण वा वर्धनाविषयी (ते) तुमची (या) जी (शुक्) विचार व साधन आहे आणि (या) जी दिव्यगुणकारी क्रिया आहे, (सा) ती विद्या व ती क्रिया (आ, प्यायताम्) सर्वदृष्ट्या विकसित तसेच (निः स्त्यायताम्) निरंतर वृद्धिंगत होत राहो. हे (घर्म) दिवसाच्या प्रकाशाप्रमाणे उज्वल विद्येचे स्वामी, पुरुष वा स्वामीनी स्त्री, (ते) तुझी (या) जी (अन्तरिक्षे) आकाशाविषयी (शुक्) सूर्याच्या दीप्तीप्रमाणे विमान आदी यानांची गमन-आगमन विद्या आहे, तसेच (आग्नीधे) अग्नी विषयी (त्रिष्टुभि) त्रिष्टुप्) छंदातील मंत्रात जे विचार व निर्माणरीती सांगितली आहे (ते) तुझी (सा) ती (विमान विद्या व निर्माणरीती) (आ, प्यायताम्) वाढत जावी आणि (नि, स्त्यायताम्) निरंतर उपयोगात येत राहो. (तस्यै) ती विद्या व क्रिया (ते) तुझ्यासाठी (स्वाहा) सत्य व्हावी. हे (घर्म) विद्युत प्रकाशाप्रमाणे कीर्तीमान स्त्री वा पुरूष, (पृथिव्याम्) भूमीवर आणि (सदस्या) सभेमधे (ते) तुझी (या) जी (जगत्याम्) चेतन सृष्टीमधे (शक्) प्रकाशयुक्त क्रिया आहे (सा) ती (ते) तुझी क्रिया (आ, प्यायताम्) वाढव राहो आणि (निः स्त्यायताम्) निरंतर लोकांशी संबधित (त्यांच्या उपयोगाची अशी) राहो. (तस्यै) त्या क्रियेसाठी आणि (ते) तुझ्यासाठी (स्वाहा) आमची ही वाणी सत्य सिद्द होवो ॥18॥
Essence
भावार्थ - जे स्त्री-पुरूष दिव्य क्रिया, शुद्ध उपासना आणि पवित्र विज्ञानामुळे प्रख्यात होतात, त्यांचाच मनुष्यजन्म हा सार्थक वा सफल होतो. इतर लोकांनीही त्यांच्याप्रमाणेच वागले पाहिजे.
Subject
स्त्री-पुरूषांनी काय करावे, याविषयी -