Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 7

21 Mantra
37/7
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- कण्व ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्रैतु॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॒ प्र दे॒व्येतु सू॒नृता॑। अच्छा॑ वी॒रं नर्यं॑ प॒ङ्क्तिरा॑धसं दे॒वा य॒ज्ञं न॑यन्तु नः। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे॥७॥

प्र। ए॒तु॒। ब्रह्म॑णः। पतिः॑। प्र। दे॒वी। ए॒तु॒। सू॒नृता॑। अच्छ॑। वी॒रम्। नर्य्य॑म्। प॒ङ्क्तिरा॑धस॒मिति॑ प॒ङ्क्तिऽरा॑धसम्। दे॒वाः। य॒ज्ञम्। न॒य॒न्तु॒। नः॒ ॥ म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒ शी॒र्ष्णे। म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒ शी॒र्ष्णे ॥७ ॥

Mantra without Swara
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरन्नर्यम्पङ्क्तिराधसन्देवा यज्ञन्नयन्तु नः । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

प्र। एतु। ब्रह्मणः। पतिः। प्र। देवी। एतु। सूनृता। अच्छ। वीरम्। नर्य्यम्। पङ्क्तिराधसमिति पङ्क्तिऽराधसम्। देवाः। यज्ञम्। नयन्तु। नः॥ मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा शीर्ष्णे। मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा शीर्ष्णे॥७॥

Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

मराठी
Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar) - मराठी
Meaning
शब्दार्थ - हे विद्वान, (आम्हा यम प्रेमीजनांची प्रार्थना वा कामना आहे की) (वीरम्) जनसमूहाना एकत्रित करणारा वा समाजात ऐक्य घडविणारा जो (यज्ञम्) सुखप्राप्तीचे कारण असलेला हा विशिष्ट पूज्य मनुष्य आहे, तो आणि (देवाः) विद्वज्जन (नः) आम्हा (यज्ञप्रेमीजनांना) (नयन्तु) प्राप्त व्हावेत. (ब्रह्मणः, पतिः) धनाचे रक्षण करणारा धनिक मनुष्य (प्र, एतु) आम्हाला अवश्य प्राप्त व्हावा (कारण की यज्ञपूर्तीसाठी धन हे नितांत आवश्यक आहे) तसेच यज्ञकार्यासाठी (सूनृता) सत्यभाषिणी व सदाचारिणी (देवी) विदुषी स्त्री (अच्छ) (प्र, एतु) सहज प्राप्त व्हावी (इथे द्यावी) हे विद्वान, (त्वा) आपराला (मकाय) विद्यावृद्धीसाठी आणि (मखस्य) सुखाच्या रक्षणासाठी (शीर्ष्णे) उत्तम अंग वा साधने प्राप्त करण्यासाठी आम्ही (त्वा) आपणास प्राचारण करीत आहेत. (मखाय) धर्माचरणासाठी (त्वा) आपणास (मखाय) सुखप्रदान करण्यासाठी (त्वा) आपणास आणि (मखास्य) सुखवृद्धी करण्यास (शीर्ष्णे) उत्तम सहकारी लोकांसाठी आम्ही (त्वा) आपणास निमंत्रित करीत आहोत. ॥7॥
Essence
भावार्थ - जे पुरुष वा स्त्रिया स्वतः विद्या आदी गुण प्राप्त करुन इतरांनाही ते देतात आणि अशाप्रकारे समाजात विद्या, धर्म आणि सुखाची वृद्धी करण्याकरिता झटतात, सर्वांना सुशिक्षित व विद्यावान करतात, ते पुरुष व त्या स्त्रिया आनंदी राहतात. ॥7॥
Subject
स्त्री-पुरुष कसे असावेत, याविषयी -