Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

Yajurveda Adhyay 33 / Mantra 42

97 Mantra
33/42
Devata- सूर्यो देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒द्या दे॑वा॒ऽउदि॑ता॒ सूर्य्य॑स्य॒ निरꣳह॑सः पिपृ॒ता निर॑व॒द्यात्।तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वीऽउ॒त द्यौः॥४२॥

अ॒द्य। दे॒वाः॒। उदि॒तेत्युत्ऽइ॑ता। सूर्य्य॑स्य। निः। अꣳह॑सः। पि॒पृ॒त। निः। अ॒व॒द्यात् ॥ तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। मा॒म॒ह॒न्ता॒म्। म॒म॒ह॒न्ता॒मिति॑ ममहन्ताम्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः ॥४२ ॥

Mantra without Swara
अद्या देवाऽउदिता सूर्यस्य निरँहसः पिपृता निरवद्यात् । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥

अद्य। देवाः। उदितेत्युत्ऽइता। सूर्य्यस्य। निः। अꣳहसः। पिपृत। निः। अवद्यात्॥ तत्। नः। मित्रः। वरुणः। मामहन्ताम्। ममहन्तामिति ममहन्ताम्। अदितिः। सिन्धुः। पृथिवी। उत। द्यौः॥४२॥

Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

मराठी
Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar) - मराठी
Meaning
शब्दार्थ - हे (देवाः) विद्वज्जनहो, आपण (सूय्यस्य) (उदित) सूर्योदयापासून (सूर्यास्तापर्यंत) (अघ) आज (नः) आम्हाला (अंहसः) पापकर्मापासून (निः) निरंतर दुर ठेवा. तसेच (अवद्यात) निंदनीय वा अप्रिय दुःखापासून (निः, पिपृत) निरंतर दूर ठेवा. (तत्) या व्यतिरिक्त (मित्र) (वरूणः) श्रेष्ठ (आमचे मित्रगण व समाजातील श्रेष्ठ जन) तसेच (आदितिः) अंतरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमी (उत) आणि (द्यौः) प्रकाशलोक, हे सर्व आम्हा (सामान्यजनांना) (मामहन्ताम्) आमचे रक्षण करीत आम्हास कीर्तीमंत करोत ॥42॥
Essence
भावार्थ - जे विद्वज्जन आपल्या सर्वांना आपल्या प्राणासारखे मानून त्यांना सुखी-आनंदित करतात आणि दोषापासून वा दुष्कर्मापासून दूर ठेवतात, ते संसाराची शोभा आहेत. ॥42॥
Subject
पुनश्‍च, तोच विषय -