Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

Yajurveda Adhyay 22 / Mantra 27

34 Mantra
22/27
Devata- अग्न्यादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्नये॒ स्वाहा॒ सोमा॑य॒ स्वाहेन्द्रा॑य॒ स्वाहा॑ पृथि॒व्यै स्वाहा॒ऽन्तरि॑क्षाय॒ स्वाहा॑ दि॒वे स्वाहा॑ दि॒ग्भ्यः स्वाहाऽऽशा॑भ्यः॒ स्वाहो॒र्व्यै दि॒शे स्वाहा॒र्वाच्यै॑ दि॒शे स्वाहा॑॥२७॥

अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। सोमा॑य। स्वाहा॑। इन्द्रा॑य। स्वाहा॑। पृ॒थि॒व्यै। स्वाहा॑। अ॒न्तरि॑क्षाय। स्वाहा॑। दि॒वे। स्वाहा॑। दि॒ग्भ्य इति॑ दि॒क्ऽभ्यः। स्वाहा॑। आशा॑भ्यः। स्वाहा॑। उ॒र्व्यै᳖। दि॒शे। स्वाहा॑। अ॒र्वाच्यै॑। दि॒शे। स्वाहा॑ ॥२७ ॥

Mantra without Swara
अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहेन्द्राय स्वाहा पृथिव्यै स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा दिवे स्वाहा दिग्भ्यः स्वाहाशाभ्यः स्वाहोर्व्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहा ॥

अग्नये। स्वाहा। सोमाय। स्वाहा। इन्द्राय। स्वाहा। पृथिव्यै। स्वाहा। अन्तरिक्षाय। स्वाहा। दिवे। स्वाहा। दिग्भ्य इति दिक्ऽभ्यः। स्वाहा। आशाभ्यः। स्वाहा। उर्व्यै। दिशे। स्वाहा। अर्वाच्यै। दिशे। स्वाहा॥२७॥

Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

मराठी
Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar) - मराठी
Meaning
शब्दार्थ - मनुष्यांनी (अग्नेय) जाठराग्नीसाठी म्हणजे पोटातील अन्नपचन करणाऱ्या अग्नीसाठी (स्वाहा) उत्तम क्रिया करावी (सोमाय) उत्तम रसासाठी (स्वाहा) सुंदर क्रिया करावी. (इन्द्राय) प्राणासाठी, विद्युत आणि परमैश्वर्यासाठी (स्वाहा) उक्त क्रिया करावी (अन्तरिक्षाय) आकाशासाठी (स्वाहा) (दिवे) प्रकाशासाठी (स्वाहा) (दिग्भ्यः) पूर्व आदी दिशांसाठी (स्वाहा) उत्तम क्रिया केली पाहिजे. (आशाभ्यः) ज्या दिशा एकमेकात मिसळतात अशा त्या ईशान आदी कोण-दिशांसाठी (स्वाहा) (उर्व्यै) समय मोसमाप्रमाणे विविध रूप दाखविणाऱ्या दिशा म्हणजे पावसाळा, उन्हाळा, शरद ऋतू आदी निसर्गरूपांची वेगवेगळी अनुभूती करून देणाऱ्या (दिशे) दिशांसाठी (स्वाहा) उत्तम क्रिया केली पाहिजे. आणि (अर्वाच्यै) निम्न (दिशे) दिशेसाठी (स्वाहा) उत्तम क्रिया सर्व मनुष्यांनी आचरण केली पाहिजे. (उत्तम क्रिया म्हणजे यज्ञकर्म) ॥27॥
Essence
भावार्थ - जे लोक अग्नीत होम करून औषधी व सुगंधित वनस्पती, पदार्थांचा विस्तार करतात, ते सर्व जगाचे कल्याण करणारे असतात. ॥27॥
Subject
पुन्हा तोच विषय -