Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 14

65 Mantra
15/14
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- ब्राह्मी जगती, ब्राह्मी त्रिष्टुप् Swara- निषादः, धैवतः
Mantra with Swara
अधि॑पत्न्यसि बृह॒ती दिग्विश्वे॑ ते दे॒वाऽअधि॑पतयो॒ बृह॒स्पति॑र्हेती॒नां प्र॑तिध॒र्त्ता त्रि॑णवत्रयस्त्रि॒ꣳशौ त्वा॒ स्तोमौ॑ पृथि॒व्या श्र॑यतां वैश्वदेवाग्निमारु॒तेऽउ॒क्थेऽअव्य॑थायै स्तभ्नीता शाक्वररैव॒ते साम॑नी॒ प्रति॑ष्ठित्याऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ऽऋष॑यस्त्वा प्रथम॒जा दे॒वेषु॑ दि॒वो मात्र॑या वरि॒म्णा प्र॑थन्तु विध॒र्त्ता चा॒यमधि॑पतिश्च॒ ते त्वा॒ सर्वे॑ संविदा॒ना नाक॑स्य पृ॒ष्ठे स्व॒र्गे लो॒के यज॑मानञ्च सादयन्तु॥१४॥

अधि॑प॒त्नीत्यधि॑ऽपत्नी। अ॒सि॒। बृ॒ह॒ती। दिक्। विश्वे॑। ते॒। दे॒वाः। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतयः। बृह॒स्पतिः॑। हे॒ती॒नाम्। प्र॒ति॒ध॒र्त्तेति॑ प्रतिऽध॒र्त्ता। त्रि॒ण॒व॒त्र॒य॒स्त्रि॒ꣳशौ। त्रि॒न॒व॒त्र॒य॒स्त्रि॒ꣳशाविति॑ त्रिनवऽत्रयस्त्रि॒ꣳशौ। त्वा॒। स्तोमौ॑। पृ॒थि॒व्याम्। श्र॒य॒ता॒म्। वै॒श्व॒दे॒वा॒ग्नि॒मा॒रु॒त इति॑ वैश्वदेवाग्निमारु॒ते। उ॒क्थे इत्यु॒क्थे। अव्य॑थायै। स्त॒भ्नी॒ता॒म्। शा॒क्व॒र॒रै॒व॒त इति॑ शाक्वररैव॒ते। साम॑नी॒ इति॒ऽसाम॑नी। प्रति॑ष्ठित्यै। प्रति॑स्थित्या॒ इति॒ प्रति॑ऽस्थित्यै। अ॒न्तरि॑क्षे। ऋष॑यः। त्वा॒। प्र॒थ॒म॒जा इति॑ प्रथम॒ऽजाः। दे॒वेषु॑। दि॒वः। मात्र॑या। व॒रि॒म्णा। प्र॒थ॒न्तु॒। वि॒ध॒र्त्तेति॑ विऽध॒र्त्ता। च॒। अ॒यम्। अधि॑पति॒रित्यधि॑ऽपतिः। च॒। ते। त्वा॒। सर्वे॑। सं॒वि॒दा॒ना इति॑ सम्ऽविदा॒नाः। नाक॑स्य। पृ॒ष्ठे। स्व॒र्ग इति॑ स्वः॒ऽगे। लो॒के। यज॑मानम्। च॒। सा॒द॒य॒न्तु॒ ॥१४ ॥

Mantra without Swara
अधिपत्न्यसि बृहती दिग्विश्वे ते देवाऽअधिपतयो बृहस्पतिर्हेतीनाम्प्रतिधर्ता त्रिणवत्रयस्त्रिँशौ त्वा स्तोमौ पृथिव्याँ श्रयताँवैश्वदेवाग्निमारुतेऽउक्थेऽअव्यथायै स्तभ्नीताँ शाक्वररैवते सामनी प्रतिष्ठित्याऽअन्तरिक्षऽऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे सँविदाता नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानञ्च सादयन्तु ॥

अधिपत्नीत्यधिऽपत्नी। असि। बृहती। दिक्। विश्वे। ते। देवाः। अधिपतय इत्यधिऽपतयः। बृहस्पतिः। हेतीनाम्। प्रतिधर्त्तेति प्रतिऽधर्त्ता। त्रिणवत्रयस्त्रिꣳशौ। त्रिनवत्रयस्त्रिꣳशाविति त्रिनवऽत्रयस्त्रिꣳशौ। त्वा। स्तोमौ। पृथिव्याम्। श्रयताम्। वैश्वदेवाग्निमारुत इति वैश्वदेवाग्निमारुते। उक्थे इत्युक्थे। अव्यथायै। स्तभ्नीताम्। शाक्वररैवत इति शाक्वररैवते। सामनी इतिऽसामनी। प्रतिष्ठित्यै। प्रतिस्थित्या इति प्रतिऽस्थित्यै। अन्तरिक्षे। ऋषयः। त्वा। प्रथमजा इति प्रथमऽजाः। देवेषु। दिवः। मात्रया। वरिम्णा। प्रथन्तु। विधर्त्तेति विऽधर्त्ता। च। अयम्। अधिपतिरित्यधिऽपतिः। च। ते। त्वा। सर्वे। संविदाना इति सम्ऽविदानाः। नाकस्य। पृष्ठे। स्वर्ग इति स्वःऽगे। लोके। यजमानम्। च। सादयन्तु॥१४॥

Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar)

मराठी
Yajurveda Bhashya (Pt. Vedkumar Vedalankar) - मराठी
Meaning
शब्दार्थ - हे स्त्री (पत्नी) तू (बृहती) महान असून (अधिपत्नी) सर्व दिशापेक्षा वर असलेल्या (दिरु) ऊर्ध्वदिशेप्रमाणे (असि आहेस. (सर्वश्रेष्ठ आहेस) (ते) तुझा पती देखील (विश्वे) सर्व (देवा:) प्रकाशक सूर्य आदी पदार्थांप्रमाणे (अधिपतय:) अधिष्ठाता (वा कीर्तिमान महान पुरुष) आहे. (बृहस्पति:) जो सूर्य या विश्वाचा महान रक्षक आहे (हेतीनाम्) विशाल गृहनक्षत्रादीचा (प्रतिधर्ता धारणकर्ता आहे, त्याप्रमाणे विश्वास आणि धीर देणार्‍या तुझ्या पतीने (त्वा) तुला (च) आणि (त्रिवूत्रयत्रिंशौ) अकरा आणि तेहतीस प्रकारे (स्तोमौ) स्तुती करण्याच्या साधनांद्वारे (पृथिव्याम्) या पृथिवी (अन्यथायै) पीडारहित व सुखी करावे त्याने (वैश्वदेवाग्निमारूते) सर्व विद्वानांचा आणि अग्नी आदी वायूंविषयी ज्ञान सांगणार्‍या (उस्थे) वेदांतील भागांचा (श्रयताम्) आश्रय घ्यावा (तुझ्या पतीने सुख प्राप्त करण्यासाठी विविध प्रकारे विद्वज्जन आणि वेद यांचे अध्ययन-श्रवण करावे) तुम्ही (पती-पत्नी) दोघे (प्रतिष्ठित्यै) सम्मानित-प्रतिष्ठित होण्यासाठी (शाक्वररैवते) शक्वरी आणि रेवती छंदांतील मंत्रांत सांगितलेल्या (सामनी) सामवेदाच्या दोन भागांची (स्तभ्नीताम्) संगती करा (अभ्यास करा) (अन्तरिक्षे) अवकाशात (प्रथमजा:) आदिकाळी उत्पन्न झालेले (ऋषय:) धनंजय आदी स्थू आणि सुक्ष्म वायू आणि प्राणशक्ती आहे तसेच (देवेषु) दिव्य गुणवान पदार्थांमधे (दिव्य:) प्रकाशाची जी मात्रा आहे आणि विरिम्णा) जे अधिक्य आहे, त्याद्वारे (त्वा) ती प्राणशक्ती तुला वृद्धिंगत करतात, त्याप्रकारे (समाजातील इतर) मनुष्यांनादेखील तुला (प्रथन्तु) वाढवावे (तुझ्या प्राणशक्ती व ज्ञानामधे वृद्धी करावी) (अयम्) हा (अधिपति:) (सर्वांचा पालक, प्रेरक) स्वामी (विधर्त्ता) विविधप्रकारे सर्वांना धारण करणारा सूर्य आहे, त्याचप्रमाणे (संविदाना:) सत्य, सदाचारी, ज्ञानी विद्वज्जन (त्वा) तुला (साकस्य) (पृष्ठे) सुखकारक स्थानामधे (स्वर्गे) (लोके) आनंदमय प्रदेशामधे स्थापित करतात (तुला ज्ञान आणि उपदेश देऊन सुखप्राप्तीचा मार्ग दाखवितात) (ते) (सर्वे) त्या सर्व विद्वानांनी (आणि सूर्यादी प्राणदायक शक्तीनी) तुला आणि (यजमान) तुझ्या यजमान पतीला (सादयन्तु) स्थि करावे (सुखी होण्याचे उपाय सतत सांगावेत) तुम्ही दोघे त्या विद्वज्जनांच्या मार्गदर्शनाप्रमाणे आवरण करीत जा. ॥14॥
Essence
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. ज्याप्रमाणे सर्वांच्या अंतर्गत असणारी (ऊर्ध्व) दिशा सर्व दिशांपेक्षा अधिक व श्रेष्ठ आहे, त्याप्रमाणे सर्व गुणांपेक्षा शरीराचे आणि आत्म्याची शक्ती अधिक असते, सर्वांनी हे नीट जाणून घ्यावे. ॥14॥
Subject
पुढक्षल मंत्रात तोच विषय आहे -