Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 9

39 Mantra
9/9
Devata- वीरो देवता Rishi- बृहस्पतिर्ऋषिः Chhand- धृति Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ज॒वो यस्ते॑ वाजि॒न्निहि॑तो॒ गुहा॒ यः श्ये॒ने परी॑त्तो॒ऽअच॑रच्च॒ वाते॑। तेन॑ नो वाजि॒न् बल॑वा॒न् बले॑न वाज॒जिच्च॒ भव॒ सम॑ने च पारयि॒ष्णुः। वाजि॑नो वाजजितो॒ वाज॑ꣳ सरि॒ष्यन्तो॒ बृह॒स्पते॑र्भा॒गमव॑जिघ्रत॥९॥

ज॒वः। यः। ते॒। वा॒जि॒न्। निहि॑त॒ इति॑ निऽहि॑तः। गुहा॑। यः। श्ये॒ने। परी॑त्तः। अच॑रत्। च॒। वाते॑। ते॑न। नः॒। वा॒जि॒न्। बल॑वा॒निति॒ बल॑ऽवान्। बले॑न। वा॒ज॒जिदिति॑ वाज॒ऽजित्। च॒। भव॑। सम॑ने। च॒। पा॒र॒यि॒ष्णुः। वाजि॑नः। वा॒ज॒जि॒त इति॑ वाजऽजितः। वाज॑म्। स॒रि॒ष्यन्तः॑। बृह॒स्पतेः॑। भा॒गम्। अव॑। जि॒घ्र॒त॒ ॥९॥

Mantra without Swara
जवो यस्ते वाजिन्निहितो गुहा यः श्येने परीत्तो अचरच्च वाते । तेन नो वाजिन्बलवान्बलेन वाजजिच्च भव समने च पारयिष्णुः । वाजिनो वाजजितो वाजँ सरिष्यन्तो बृहस्पतेर्भागमव जिघ्रत ॥

जवः। यः। ते। वाजिन्। निहित इति निऽहितः। गुहा। यः। श्येने। परीत्तः। अचरत्। च। वाते। तेन। नः। वाजिन्। बलवानिति बलऽवान्। बलेन। वाजजिदिति वाजऽजित्। च। भव। समने। च। पारयिष्णुः। वाजिनः। वाजजित इति वाजऽजितः। वाजम्। सरिष्यन्तः। बृहस्पतेः। भागम्। अव। जिघ्रत॥९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वाजिन् !) वेगवान् सेनाध्यक्ष राजन् ! (ते) आपका (यः) जो (जवः) वेग (गुहायाम्) बुद्धि में (निहितः) स्थित है, और जो (श्येने) बाज पक्षी के समान (परीतः) सब ओर से भयप्रदान करता है, और जो (वाते) वायु के समान (अचरत्) विचरण करता है इसलिये (नः) हमारे (बलेन) सेना वा पराक्रम से (बलवान्) अत्यन्त बलवान् बनो।
हे (वाजिनः!) वेगवान राजन् ! अपने वेग और बल से (समने) संग्राम में (पारयिष्णुः) दुःख से पार करने वाले और (वाजजित्) संग्राम को जीतने वाले (भव) बनो ।
है (वाजिनः!) प्रशस्त वेग से युक्त योद्धाओ !तुम (बृहस्पतेः) महान् वीरों के पालक सेनाध्यक्ष की [भागम्] सेवा को प्राप्त करके (वाजम्) बोध वा अन्न आदि को (सरिष्यन्तः) प्राप्त करते हुये [वाजजितः] संग्रामों को जीतने वाले बनो और (अवजिघ्रत) नाना सुगन्ध वा बोध को ग्रहण करो ॥
९ । ९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥राजा पूर्ण शरीर बल और आत्म-बल को प्राप्त करके बाज पक्षी और वायु के समान शत्रुओं के विजय में यशस्वी होकर अपने मन्त्रियों तथा सब सुशिक्षित बल और सुख से युक्त धार्मिक सैनिकों की सदा रक्षा करे।
सब राजपुरुष तथा प्रजाजन शत्रुओं को जीतकर परस्पर प्रेम से रहें ॥९। ९॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, यह उपदेश किया है॥
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२।१।४। १०) में की गई है ॥९ । ९॥
Commentary Essence
१. राजा कैसा हो--सेनाध्यक्ष राजा शरीरबल और आत्मबल से परिपूर्ण हो। उसका जो छुपा हुआ बल है तथा जो बाज-पक्षी एवं वायु के समान प्रकट बल है, उससे राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके यशस्वी बने। अपने सैनिकों तथा सेवक-जनों को भी राजा बलवान बनावे और उन्हें सुखी रखे। सैनिकों और सेवकों को बलवान बनाकर राजा स्वयं अत्यन्त बलवान् बनता है ।
बलवान् राजा संग्राम में दुःख से पार करने वाला तथा संग्राम का विजेता होता है । महान् वीरों के पालक सेनाध्यक्ष राजा की प्रशस्त बल वाले योद्धा लोग सेवा करें, उसकी आज्ञा का पालन करें। संग्राम को जीत कर राजा से उत्तम सुगन्धित अन्न आदि पदार्थों एवं विज्ञान (बोध) को प्राप्त करें । परस्पर प्रीति से रहे ॥
अलङ्कार—मन्त्र में उपमावाचक शब्द लुप्त है, अतः वाचकलुपतोपमा अलङ्कार है॥ उपमा यह कि राजा बाज-पक्षी और वायु के समान वेगवान् (बलवान्) हो॥९। ९॥