Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 8

39 Mantra
9/8
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- बृहस्पतिर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वात॑रꣳहा भव वाजिन् यु॒ज्यमा॑न॒ऽइन्द्र॑स्येव॒ दक्षि॑णः श्रि॒यैधि॑। यु॒ञ्जन्तु॑ त्वा म॒रुतो॑ वि॒श्ववे॑दस॒ऽआ ते॒ त्वष्टा॑ प॒त्सु ज॒वं द॑धातु॥८॥

वात॑रꣳहा॒ इति वात॑ऽरꣳहाः। भ॒व॒। वाजि॑न्। युज्यमा॑नः। इन्द्र॑स्ये॒वेतीन्द्र॑स्यऽइव। दक्षि॑णः। श्रि॒या। ए॒धि॒। यु॒ञ्जन्तु॑। त्वा॒। म॒रुतः॑। वि॒श्ववे॑दस॒ इति॑ वि॒श्वऽवे॑दसः। आ। ते॒। त्वष्टा॑। प॒त्स्विति॑ प॒त्ऽसु। ज॒वम्। द॒धा॒तु॒ ॥८॥

Mantra without Swara
वातरँहा भव वाजिन्युज्यमान इन्द्रस्येव दक्षिणः श्रियैधि । युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आ ते त्वष्टा पत्सु जवन्दधातु ॥

वातरꣳहा इति वातऽरꣳहाः। भव। वाजिन्। युज्यमानः। इन्द्रस्येवेतीन्द्रस्यऽइव। दक्षिणः। श्रिया। एधि। युञ्जन्तु। त्वा। मरुतः। विश्ववेदस इति विश्वऽवेदसः। आ। ते। त्वष्टा। पत्स्विति पत्ऽसु। जवम्। दधातु॥८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वाजिन्) शास्त्रोक्त कर्म-कुशलता को जानने वाले पुरुष ! जिस (त्वा) तुझको (विश्ववेदसः) सकल विद्याओं के वेत्ता (मरुतः) विद्वान् मनुष्य राज्य के शिल्प कार्यों में (युञ्जन्तु) प्रेरित करें, और (त्वष्टा) वेग आदि गुणों की विद्या को जानने वाला विद्वान् (ते) आपके (पत्सु) चरणों में (जवम्) वेग को (आदधातु) स्थापित करे, सो आप (वातरंहाः) वायु के समान वेगवान (भव)बनो। (युज्यमानः) समाधियुक्त होकर आप (दक्षिणः) प्रशस्त बल एवं गति वाले बनकर (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य से युक्त राजा के समान (श्रिया) शोभायुक्त राज्यलक्ष्मी अथवा देदीप्यमान रानी के साथ (एधि) वृद्धि को प्राप्त करें ॥९ । ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है ॥ हे राजा-सम्बन्धी स्त्री-पुरुषो ! तुम लोग निरभिमानी, ईर्ष्या-द्वेष से रहित होकर, विद्वानों के संग से राज्यधर्म का पालन करके, विमान अदि यानों में बैठकर, अभीष्ट देशों में जाकर, नित्य जितेन्द्रिय बन, प्रजा को सदा प्रसन्न करके, श्रीमान् (धनवान्) बनो ॥ ९ । ८ ॥
Subject
उस राजा को विद्वान लोग क्या-क्या उपदेश करें ॥
Refrences
इस मन्त्र की शत० (५।१।४ ।९) में की गई है ॥९ । ८॥
Commentary Essence
राजा को विद्वान् क्या-क्या उपदेश करें--हे राजन् ! तथा राजा से सम्बन्धित स्त्री पुरुषो ! तुम लोग निरभिमानी बनो, ईर्ष्या द्वेष से दूर रहो, सकल विद्याओं के वेत्ता विद्वानों के संग से राज्य के कर्त्तव्यों का पालन करो, शिल्पविद्या को बढ़ा कर विमान आदि यानों की रचना करो, वेग आदि गुणों की विद्या के ज्ञाता विद्वान् से उक्त विद्या ग्रहण करके अपने पैरों में वेग कोधारण करो अर्थात् विमान आदि यानों में बैठ कर अभीष्ट देश में गमन करो, वायु के समान वेगवान बनो, समाहित अर्थात् जितेन्द्रिय होकर प्रशस्त बल वाले बनो और प्रजा को सदा प्रसन्न रखो । परम ऐश्वर्य से युक्त होकर सुन्दर राज्यलक्ष्मी से सदा देदीप्यमान रहो, अपनी रानी के सहित वृद्धि को प्राप्त करो।
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि राजा लोग वायु के समान वेगवान् हों ॥ ९ । ८ ॥