Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 6

39 Mantra
9/6
Devata- अश्वो देवता Rishi- बृहस्पतिर्ऋषिः Chhand- भूरिक जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒प्स्वन्तर॒मृत॑म॒प्सु भे॑ष॒जम॒पामु॒त प्रश॑स्ति॒ष्वश्वा॒ भव॑त वा॒जिनः॑। देवी॑रापो॒ यो व॑ऽऊ॒र्मिः प्रतू॑र्तिः क॒कुन्मा॑न् वाज॒सास्तेना॒यं वाज॑ꣳ सेत्॥६॥

अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। अ॒न्तः। अ॒मृत॑म्। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। भे॒ष॒जम्। अ॒पाम्। उ॒त। प्रश॑स्ति॒ष्विति॒ प्रऽश॑स्तिषु। अश्वाः॑। भव॑त। वा॒जिनः॑। देवीः॑। आ॒पः॒। यः। वः॒। ऊ॒र्मिः। प्रतू॑र्त्तिरिति॒ प्रऽतू॑र्त्तिः। क॒कुन्मा॒निति॑ क॒कुत्ऽमा॑न्। वा॒ज॒सा इति॑ वाज॒ऽसाः। तेन॑। अ॒यम्। वाज॑म्। से॒त् ॥६॥

Mantra without Swara
अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तिष्वश्वा भवत वाजिनः । देवीरापो यो वऽऊर्मिः प्रतूर्तिः ककुन्मान्वाजसास्तेनायं वाजँ सेत् ॥

अप्स्वित्यप्ऽसु। अन्तः। अमृतम्। अप्स्वित्यप्ऽसु। भेषजम्। अपाम्। उत। प्रशस्तिष्विति प्रऽशस्तिषु। अश्वाः। भवत। वाजिनः। देवीः। आपः। यः। वः। ऊर्मिः। प्रतूर्त्तिरिति प्रऽतूर्त्तिः। ककुन्मानिति ककुत्ऽमान्। वाजसा इति वाजऽसाः। तेन। अयम्। वाजम्। सेत्॥६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (देवीः) दिव्यगुणों से युक्त (आपः) अन्तरिक्ष में व्याप्त जल के समान शान्त विदुषी और विद्वान पुरुषो ! तुम लोग--जो (व:) तुम्हारा समुद्र के समान (ककुन्मान्) प्रशस्त चञ्चल गुणों वाला, (वाजसा:) संग्रामों का संसेवन करने वाला, (प्रतूर्त्तिः) उत्कृष्ट तीव्र गति वाला (ऊर्मि:) तरङ्ग के समान सबको आच्छादित करने वाला पराक्रम है और जो (अप्सु-अन्तः) प्राणों में (अमृतम्) मरण धर्म से रहित, मूल कारण, वा अल्पायु को निवारण करने वाला अमृत नामक गुण है,[उत] और जो (अप्सु) जलों में (भेषजम्) रोग नाशक औषध का गुण है जिससे (अयम्) यह सेनापति (वाजम्) संग्राम और अन्न का (सेतु) प्रबन्ध करता, है इसलिये (अपाम्) जल के (प्रशस्तिषु) गुणों की प्रशंसा में (वाजिनः) प्रशस्त बल वा पराक्रम वाले (अश्वाः) वेगवान अश्वों के समान (भवत) बनो ॥९ ।६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥स्त्रियाँ सागर के समान गम्भीर, जल के समान शान्त स्वभाव वाली, वीरों को उत्पन्न करने वाली, उत्तम औषधों का सेवन करने वाली, जल आदि पदार्थों को जानने वाली हों, इसी प्रकार जो पुरुष वायु और जल के गुणों को जानने वाले पुरुषों से संयुक्त होते हैं, वे स्त्री और पुरुष नीरोग होकर विजयी होते हैं ॥९। ६॥
Subject
फिर स्त्री पुरुषों को कैसा होना चाहिये, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
(ककुन्मान्) यहाँ'कक्' धातु से उणादि का उणा० (१ । ९४) सूत्र से 'उति' प्रत्यय है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ ।१।४।६) में की गई है ॥९ । ६॥
Commentary Essence
१.स्त्री और पुरुष कैसे हों--स्त्रियाँ दिव्य गुणों से युक्त अर्थात् सागर के समान गम्भीर, जल के समान शान्त स्वभाव वाली, वीरों को उत्पन्न करने वाली, उत्तम औषधों को सेवन करने वाली, जल आदि पदार्थों के गुणों को जानने वाली हों।
पुरुष विद्वान् हों, जो समुद्र के समान चंचलता गुण से युक्त हो अर्थात् आलसी न हों, संग्रामों का सेवन करने वाले, अत्यन्त तीव्र गति वाले, समुद्र की तरङ्ग के समान सबको आच्छादित करने वाले पराक्रमी हों। प्राणों में जो अमृत नामक गुण है, जिससे अल्पायु में मृत्यु का निवारण होता है, उससे संग्राम का सेवन करें। जलों में जो रोगनाशक औषध के तुल्य गुण है, उससे अन्न का विधिवत् सेवन करें। प्राण और जल के प्रशस्त गुणों को जानकर पुरुष-प्रशस्त पराक्रम और बल वाले अश्व के समान वेगवान बनें। जो पुरुष प्राण (वायु) और जल के गुणों के वेत्ता पुरुषों के साथ संग करके उनके गुणों को जानकर उनका ठीक-ठीक प्रयोग करते हैं वे नीरोग होकर सदा विजयी होते हैं ।
२. अलङ्कार--मन्त्र में उपमावाचक शब्द लुप्त है, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥उपमा यह है कि स्त्री और पुरुष सागर के समान गम्भीरता आदि गुणों से युक्त हों ॥ ९। ६ ॥