Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 25

39 Mantra
9/25
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- स्वराट त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वाज॑स्य॒ नु प्र॑स॒व आब॑भूवे॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑नानि स॒र्वतः॑। सने॑मि॒ राजा॒ परि॑याति वि॒द्वान् प्र॒जां पुष्टिं॑ व॒र्धय॑मानोऽअ॒स्मे स्वाहा॑॥२५॥

वाज॑स्य। नु। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वः। आ। ब॒भू॒व॒। इ॒मा। च॒। विश्वा॑। भुव॑नानि। स॒र्वतः॑। सने॑मि। राजा॑। परि॑। या॒ति॒। वि॒द्वान्। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। पुष्टि॑म्। व॒र्धय॑मानः। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। स्वाहा॑ ॥२५॥

Mantra without Swara
वाजस्य नु प्रसव आबभूवेमा च विश्वा भुवनानि सर्वतः । सनेमि राजा परियाति विद्वान्प्रजाम्पुष्टिँवर्धयमानो ऽअस्मे स्वाहा ॥

वाजस्य। नु। प्रसव इति प्रऽसवः। आ। बभूव। इमा। च। विश्वा। भुवनानि। सर्वतः। सनेमि। राजा। परि। याति। विद्वान्। प्रजामिति प्रऽजाम्। पुष्टिम्। वर्धयमानः। अस्मेऽइत्यस्मे। स्वाहा॥२५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (वाजस्य) वेदादि शास्त्रों से उत्पन्न बोध की (स्वाहा) सत्य नीति से (प्रसवः) उत्पन्न होने वाला (विद्वान्) सकल विद्याओं को जानने वाला विद्वान् (आ+बभूव) हो, वह (इमानि) इन (विश्वा) सब (भुवनानि) माण्डलिक राजाओं के निवास-स्थानों को और (सनेमि) सनातन धर्म से युक्त राज्यमण्डल को तथा (प्रजाम्) पालन के योग्य प्रजा को और (पुष्टिम्) पोषण को (नु) शीघ्र [सर्वतः] सब ओर से बढ़ाकर (परियाति) प्राप्त करता है वह (अस्मे) हमारा (राजा) वेदोक्त राज-गुणों से प्रकाशमान राजा (भवतु) बने ॥ ९ । २५॥
Essence
ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! तुम लोग जो व्यक्ति उत्तम गुण-कर्म-स्वभाव वाला एवं राज्य की रक्षा करने में समर्थ हो उसे सभाध्यक्ष बनाकर आप्त-नीति से राज्य करो ॥ ९ । २५॥
Subject
राजा कैसा हो, इस विषय का फिर उपदेश किया है ॥
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५।२। २ । ७) में की गई है ॥९ । २५॥
Commentary Essence
राजा कैसा हो--राजा वेदादि शास्त्रों का ज्ञाता, सच्ची आप्त नीति का वेत्ता, प्रशंसित गुण, कर्म, स्वभाव वाला एवं सकल विद्याओं का ज्ञाता विद्वान् हो । सब भुवनों अर्थात् माण्डलिक राजाओं के निवास-स्थानों को, राज्यमण्डल को, प्रजा तथा पुष्टिकारक पदार्थों को बढ़ाने वाला हो। राज्य की रक्षा करने में समर्थ हो ।
जो इन वेदोक्त राजगुणों से प्रकाशमान हो उसे ही प्रजाजन सभाध्यक्ष राजा बनाकर आप्त-जनों की नीति से राज्य करें ॥९ । २५ ॥