Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 22

39 Mantra
9/22
Devata- दिशो देवताः Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- निचृत् अत्यष्टि, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒स्मे वो॑ऽअस्त्विन्द्रि॒यम॒स्मे नृ॒म्णमु॒त क्रतु॑र॒स्मे वर्चा॑सि सन्तु वः। नमो॑ मा॒त्रे पृ॑थि॒व्यै नमो॑ मा॒त्रे पृ॑थि॒व्याऽइ॒यं ते॒ राड्य॒न्तासि॒ यम॑नो ध्रु॒वोऽसि ध॒रुणः॑। कृ॒ष्यै त्वा॒ क्षेमाय॑ त्वा र॒य्यै त्वा॒ पोषा॑य त्वा॥२२॥

अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। वः। अ॒स्तु॒। इ॒न्द्रि॒यम्। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। नृ॒म्णम्। उ॒त। क्रतुः॑। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। वर्चा॑सि। स॒न्तु॒। वः॒। नमः॑। मा॒त्रे। पृ॒थि॒व्यै। नमः॑। मा॒त्रे। पृ॒थि॒व्यै। इ॒यम्। ते॒। राट्। य॒न्ता। अ॒सि॒। यम॑नः। ध्रु॒वः। अ॒सि॒। ध॒रुणः॑। कृ॒ष्यै। त्वा॒। क्षेमा॑य। त्वा॒। र॒य्यै। त्वा॒। पोषा॑य। त्वा॒ ॥२२॥

Mantra without Swara
अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चाँसि सन्तु वः । नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यैऽइयन्ते राड् यन्तासि यमनो धु्रवो सि धरुणः कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा ॥

अस्मेऽइत्यस्मे। वः। अस्तु। इन्द्रियम्। अस्मेऽइत्यस्मे। नृम्णम्। उत। क्रतुः। अस्मेऽइत्यस्मे। वर्चासि। सन्तु। वः। नमः। मात्रे। पृथिव्यै। नमः। मात्रे। पृथिव्यै। इयम्। ते। राट्। यन्ता। असि। यमनः। ध्रुवः। असि। धरुणः। कृष्यै। त्वा। क्षेमाय। त्वा। रय्यै। त्वा। पोषाय। त्वा॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य ! मैं ईश्वर--(कृष्यै) कृषि कार्य के लिये (त्वा) तुझे, (क्षेमाय) रक्षा के लिये (त्वा) तुझे, (रय्यै) श्री=धनादि के लिये(त्वा) तुझे, (पोषाय) पुष्टि के लिये (त्वा) तुझे नियुक्त करता हूँ।
जोतू--(ध्रुवः) निश्चल (यन्ता) नियन्ता (असि) है, (धरुणः) सबको धारण करने वाला (यमनः) पुरुषार्थी (असि) है, सो (ते) तेरी (इयम्) यह (राट्) प्रकाशमान पृथिवी है इस (मात्रे) मान के योग्य (पृथिव्यै) विस्तृत भूमि के लिये (नमः) अन्न आदि को तथा इस (मात्रे) मान के योग्य (पृथिव्यै) विस्तृत भूमि के लिये (नमः) जल आदि को उत्पन्न कर।
तुम सब लोग जो (अस्मे) हमारी (इन्द्रियम्) मन आदि इन्द्रियाँ हैं वे (वः) तुम्हारी (अस्तु) हों, जो (अस्मे) मेरा (नृम्णम्) धन है वह (वः) तुम्हारा (अस्तु) हो, (उत) और जो (अस्मे) मेरी (क्रतु) बुद्धि वा कर्म है, वह (वः) तुम्हारे लिये (अस्तु) हो, जो हमारे (वर्चांसि) प्रकाशमान अध्ययन आदि हैं वे (वः) तुम्हारे लिये (सन्तु) हों, जो यह सब (वः) तुम्हारा वा तुम्हारे लिये (अस्तु) हो वह सब हमारा हो, इस प्रकार तुम परस्पर आचरण करो ॥ ९ । २२ ॥
Essence
मनुष्यों के लिये ईश्वर की यह आज्ञा है कि आप लोग सदा सत्कर्मों में प्रयत्नशील रहो, आलस्य मत करो।
पृथिवी से अन्न आदि उत्पन्न करके तथा उनकी रक्षा करके परस्पर उपकार के लिये जैसे हो वैसा आचरण करो, कभी विरोध मत करो, अपितु परस्पर हित किया करो ॥ ९ । २२॥
Subject
ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल मनुष्यों को संसार में कैसे वर्तना चाहिये, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(वर्चांसि) 'वर्चः' शब्द निघं० (२।७) में अन्न-नामों में पढ़ा है । इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५।२।१। १५-२५) में की गई है ॥९ । २२ ॥
Commentary Essence
ईश्वर आज्ञा से मनुष्य कैसे वर्ताव करें--ईश्वर आज्ञा देता है कि हे मनुष्य ! मैं तुझे कृषि-कार्य में नियुक्त करता हूँ। तू कृषि से उत्पन्न अन्न आदि की रक्षा कर। लक्ष्मी और पुष्टि को प्राप्त कर। ईश्वर की इस आज्ञा के अनुसार सब मनुष्य कृषि आदि सत्कर्मों में प्रयत्नशील रहें। आलस्य कभी न करें।
ईश्वर की आज्ञा से सब मनुष्य शुभकर्मों में निश्चल रहें, नियन्ता बनें, सब का धारण-पोषण करने वाले हों। ईश्वर की रची यह पृथिवी मनुष्य की माता है, माता के समान पालन करने वाली है। इससे अन्न आदि उत्पन्न करके उनकी रक्षा करें। सब मनुष्य मन, धन, बुद्धि वा कर्म से परस्पर उपकार करें। विद्या आदि सर्वस्व परस्पर उपकार के लिये हों। परस्पर विरोध कभी न करें अपितु ऐसा आच- रण करें जिससे एक-दूसरे का हित ही हो ॥ ९। २२ ॥