Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 21

39 Mantra
9/21
Devata- यज्ञो देवता Rishi- वसिष्ठ ऋषिः Chhand- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आयु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पतां प्रा॒णो य॒ज्ञेन॑ कल्पतां॒ चक्षु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ श्रोत्रं॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पतां पृ॒ष्ठं य॒ज्ञेन॑ कल्पतां य॒ज्ञो य॒ज्ञेन॑ कल्पताम्। प्र॒जाप॑तेः प्र॒जाऽअ॑भूम॒ स्वर्देवाऽअगन्मा॒मृता॑ऽअभूम॥२१॥

आयुः॑। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। प्रा॒णः। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। चक्षुः॑। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। श्रोत्र॑म्। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। पृ॒ष्ठम्। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। य॒ज्ञः। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒ता॒म्। प्र॒जाप॑ते॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तेः। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। अ॒भू॒म॒। स्वः॑। दे॒वाः॒। अ॒ग॒न्म॒। अ॒मृताः॑। अ॒भू॒म॒ ॥२१॥

Mantra without Swara
आयुर्यज्ञेन कल्पताम्प्राणो यज्ञेन कल्पताञ्चक्षुर्यज्ञेन कल्पताँ श्रोत्रँ यज्ञेन कल्पताम्पृष्ठँ यज्ञेन कल्पताँयज्ञो यज्ञेन कल्पताम् । प्रजापतेः प्रजाऽअभूम स्वर्देवा ऽअगन्मामृता ऽअभूम ॥

आयुः। यज्ञेन। कल्पताम्। प्राणः। यज्ञेन। कल्पताम्। चक्षुः। यज्ञेन। कल्पताम्। श्रोत्रम्। यज्ञेन। कल्पताम्। पृष्ठम्। यज्ञेन। कल्पताम्। यज्ञः। यज्ञेन। कल्पताम्। प्रजापतेरिति प्रजाऽपतेः। प्रजा इति प्रऽजाः। अभूम। स्वः। देवाः। अगन्म। अमृताः। अभूम॥२१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम्हारा (आयु:) जीवन निरन्तर (यज्ञेन) धर्मयुक्त ईश्वर की आज्ञा का पालन करने से (कल्पताम्) समर्थ हो, (प्राणः) जीवन का हेतु, बलकारी प्राण (यज्ञेन) धर्मयुक्त विद्याभ्यास से (कल्पताम्) समर्थ हो, (चक्षुः) चक्षु इन्द्रिय (यज्ञेन) शिष्टों के आचरण रूप प्रत्यक्ष विशेष से (कल्पताम्) समर्थ हो, (श्रोत्रम्) श्रोत्र इन्द्रिय (यज्ञेन) शब्दप्रमाण रूप वेदाभ्यास से (कल्पताम्) समर्थ हो, (पृष्ठम्) प्रश्न करना रूप (यज्ञेन) संवाद से (कल्पताम्) समर्थ हो, [यज्ञः] यज धातु के अर्थ--देवपूजा, संगतिकरण और दान [यज्ञेन] ब्रह्मचर्य आदि के आचरण से [कल्पताम्] समर्थ हों।
जैसे--हम लोग (प्रजापतेः) विश्वम्भर जगदीश्वर के समान धार्मिक राजा की (प्रजाः) पालन करने योग्य प्रजा (अभूम) हो, (देवाः) विद्वान् बनकर (अमृताः) मोक्ष सुख को प्राप्त करने वाले (अभूम) हों, (स्वः) सुख को (अगन्म) प्राप्त करें; ऐसा तुम निश्चय करो ॥ ९ । २१ ॥
Essence
ईश्वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि तुम लोग मेरे सदृश सत्य गुण-कर्म स्वभाव वाले राजा की प्रजा बनो, अन्य क्षुद्राशय पुरुष के प्रजाभाव को कभी स्वीकार मत करो।
जैसे मुझे न्यायाधीश मान, मेरी आज्ञा में रह कर, अपने सर्वस्व को धर्म से संयुक्त करके अभ्युदय और निःश्रेयस सुखों को नित्य प्राप्त करते हो वैसेजो पुरुष धर्मयुक्त न्याय से तुम्हारा सदा पालन करे उसी को सभापति राजा मानो ॥ ९ । २१॥
Subject
पुनः मनुष्यों के प्रति ईश्वर उपदेश करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५।२।१।४) में की गई है ॥९ । २१॥
Commentary Essence
मनुष्यों के लिये ईश्वर की आज्ञा--ईश्वर मनुष्यों को आज्ञा देता है कि हे मनुष्यो ! तुम लोग धर्मयुक्त ईश्वर की आज्ञा के पालन से आयु को, धर्मयुक्त विद्याभ्यास से जीवन के हेतु बलकारी प्राण को, शिष्ट जनों के द्वारा किये प्रत्यक्ष विशेष से चक्षु को,शब्द प्रमाण के अभ्यास से श्रोत्र को, संवाद से प्रश्न-उत्तर को, ब्रह्मचर्य आदि के आचरण से देवपूजा, संगतिकरण और दान को समर्थ बनाओ, बढ़ाओ।
तुम लोग मेरे सदृश सत्य गुण, कर्म, स्वभाव वाले पुरुष की ही प्रजा बनो, क्षुद्राशय पुरुष के निमित्त प्रजाभाव को कभी स्वीकार मत करो। जैसे तुम लोग मुझे न्यायाधीश मानकर, मेरी आज्ञा में रहकर, अपने सर्वस्व को धर्म से संयुक्त करके, विद्वान् बन कर अभ्युदय और निःश्रेयस अर्थात् मोक्षसुख को प्राप्त करते हो वैसे जो पुरुष धर्मयुक्त न्याय से तुम्हारा सदा पालन करे उसे ही सभापति राजा मानो; अन्य को नहीं ॥ ९। २१ ॥