Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 12

39 Mantra
9/12
Devata- इन्द्राबृहस्पती देवते Rishi- बृहस्पतिर्ऋषिः Chhand- स्वराट अति धृति, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए॒षा वः॒ सा स॒त्या सं॒वाग॑भू॒द् यया॒ बृह॒स्पतिं॒ वाज॒मजी॑जप॒ताजी॑जपत॒ बृह॒स्पतिं॒ वाजं॒ वन॑स्पतयो॒ विमु॑च्यध्यम्। ए॒षाः वः॒ स॒त्या सं॒वाग॑भू॒द् ययेन्द्रं॒ वाज॒मजी॑जप॒ताजी॑जप॒तेन्द्रं॒ वाजं॒ वन॑स्पतयो॒ विमु॑च्यध्वम्॥१२॥

ए॒षा। वः॒। सा। स॒त्या। सं॒वागिति॑ स॒म्ऽवाक्। अ॒भू॒त्। यया॑। बृह॒स्प॑तिम्। वाज॑म्। अजी॑जपत। अजी॑जपत। बृह॒स्पति॑म्। वाज॑म्। वन॑स्पतयः। वि। मु॒च्य॒ध्व॒म्। ए॒षा। वः॒। सा। स॒त्या। संवागिति॑ स॒म्ऽवाक्। अ॒भू॒त्। यया॑। इन्द्र॑म्। वाज॑म्। अजी॑जपत। अजी॑जपत। इन्द्र॑म्। वाज॑म्। वन॑स्पतयः। वि। मु॒च्य॒ध्व॒म् ॥१२॥

Mantra without Swara
एषा वः सा सत्या सँवागभूद्यया बृहस्पतिँवाजमजीजपताजीजपत बृहस्पतिँवाजन्वनस्पतयो विमुच्यध्वम् । एषा वः सा सत्या सँवागभूद्ययेन्द्रँवाजमजीजपताजीजपतेन्द्रँवाजँवनस्पतयो वि मुच्यध्वम् ॥

एषा। वः। सा। सत्या। संवागिति सम्ऽवाक्। अभूत्। यया। बृहस्पतिम्। वाजम्। अजीजपत। अजीजपत। बृहस्पतिम्। वाजम्। वनस्पतयः। वि। मुच्यध्वम्। एषा। वः। सा। सत्या। संवागिति सम्ऽवाक्। अभूत्। यया। इन्द्रम्। वाजम्। अजीजपत। अजीजपत। इन्द्रम्। वाजम्। वनस्पतयः। वि। मुच्यध्वम्॥१२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वनस्पतयः) किरणों के समान न्याय के पालक राजा जनो ! तुम लोग (यया) जिस वाणी से (बृहस्पतिम्) वेद-शास्त्र के पालक को (वाजम्) वेदशास्त्र के ज्ञान का (अजीजपत) उपदेश करते हो, (बृहस्पतिम्) बृहद् राज्य के पालक [वाजम्] संग्राम का (अजीजपत) उपदेश करते हो और [विमुच्यध्वम्] दुःखों से मुक्त रहते हो, वह (एषा) उक्त और वक्ष्यमाण (वः)तुम्हारी (संवाक्) राजनीति से युक्त उत्तम वाणी (सत्या) सत्य (अभूत) हो।
हे (वनस्पतयः) जङ्गलों की रक्षा करने वाले राजाओ ! तुम लोग (यया) जिस वाणी से (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्यवान् पुरुष को (वाजम्) युद्ध का (अजीजपत) उपदेश करते हो, और (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य से युक्त उत्तम लक्ष्मी के प्रापक उद्योग को एवं [वाजम्] युद्ध को (अजीजपत) प्राप्त कराते हो और [विमुच्यध्वम्] दुःखों से मुक्त करते हो वह (एषाः) यह पूर्व-अपर प्रतिपादित (वः) तुम्हारी (संवाक्) विनय और पुरुषार्थ को उत्तमता से प्रकाशित करने वाली वाणी (सत्या) सत्यभाषण युक्त (अभूत्) हो ॥ ९ । १२ ॥
Essence
राजा तथा राजा के मन्त्री, भृत्य और प्रजाजन अपनी प्रतिज्ञा तथा वाणी को कभी मिथ्या न करें। जितनी वाणी बोलें उतनी को सत्य ही करें। जिसकी वाणी सदा सत्य होती है वही सम्राट् हो सकता है, जब तक ऐसा नहीं होता तब तक राजा तथा प्रजा विश्वास को प्राप्त करके सुख की वृद्धि करने वाले नहीं हो सकते ॥९ । १२ ॥
Subject
मनुष्यों को उचित है कि वे सदा सब प्रकार से सत्य ही बोलें, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(वनस्पतयः) 'वन' शब्द निघं० (१। ५) में रश्मि-नामों में पढ़ा है । (विमुच्यध्वम्) यहां विकरण-व्यत्यय से ('श' को) 'श्यन्' हो गया है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५। १। ५ । ११-१२) में की गई है ॥९ । १२॥
Commentary Essence
सत्यभाषण--सूर्य की किरणों के समान न्याय का पालन करने वाले राजा लोग जिस वाणी से बृहस्पति अर्थात् वेद-शास्त्रों के पालक विद्वान् को समुन्नत करते हैं, एवं वेदशास्त्र के ज्ञान को बढ़ाते हैं, विशाल राज्य के पालक सम्राट् को युद्ध का उपदेश करते हैं तथा जिससे दुःखों से मुक्त होते हैं उनकी वह राजनीति-निष्णात-वाणी सदा सत्य हो।
वन आदि के पालक राजा लोग जिस वाणी से इन्द्र अर्थात् परम ऐश्वर्यवान् पुरुष को युद्ध का उपदेश करते हैं, परम ऐश्वर्य रूप उत्तम श्री (लक्ष्मी) को प्राप्त कराने वाले उद्योग को जिस वाणी से शीघ्र प्राप्त कराते हैं तथा दुःखों से मुक्त होते हैं, वह विनय और पुरुषार्थ को प्रकाशित करने वाली वाणी सदा सत्यभाषण-युक्त हो।
राजा, राजा के मन्त्री, भृत्य और प्रजा कभी भी असत्य भाषण न करें, परस्पर असत्य प्रतिज्ञा न करें। जितनी वाणी बोलें उतनी सत्य ही बोलें तथा वैसा ही आचरण करें । जिसकी वाणी सत्य भाषणयुक्त है, वही सम्राट् बन सकता है। सत्यभाषण के बिना राजा और प्रजा का परस्पर विश्वास नहीं हो सकता तथा सुख की वृद्धि कदापि नहीं हो सकती ॥९ । १२ ॥