Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 9 / Mantra 10

39 Mantra
9/10
Devata- इन्द्राबृहस्पती देवते Rishi- बृहस्पतिर्ऋषिः Chhand- विराट् उत्कृति, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
दे॒वस्या॒हꣳ स॑वि॒तुः स॒वे स॒त्यस॑वसो॒ बृहस्पते॑रुत्त॒मं नाक॑ꣳ रुहेयम्। दे॒वस्या॒हꣳ स॑वि॒तुः स॒वे स॒त्यस॑वस॒ऽइन्द्र॑स्योत्त॒मं ना॑कꣳरुहेयम्। दे॒वस्या॒हꣳ स॑वि॒तुः स॒वे स॒त्यप्र॑सवसो॒ बृह॒स्पते॑रुत्त॒मं नाक॑मरुहम्। दे॒वस्या॒हꣳ स॑वि॒तुः स॒वे स॒त्यप्र॑सवस॒ऽइन्द्र॑स्योत्त॒मं नाक॑मरुहम्॥१०॥

दे॒वस्य॑। अ॒हम्। स॒वि॒तुः। स॒वे। स॒त्यस॑वस॒ इति॑ स॒त्यऽस॑वसः। बृह॒स्पतेः॑। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम्। नाक॑म्। रु॒हे॒य॒म्। दे॒वस्य॑। अ॒हम्। स॒वि॒तुः। स॒वे। स॒त्यस॑वस॒ इति॑ स॒त्यऽसव॑सः। इन्द्र॑स्य। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम्। नाक॑म्। रु॒हे॒य॒म्। दे॒वस्य॑। अ॒हम्। स॒वि॒तुः। स॒वे। स॒त्यप्र॑सवस॒ इति॑ स॒त्यऽप्र॑सवसः। बृह॒स्पतेः॑। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम्। नाक॑म्। अ॒रु॒ह॒म्। दे॒वस्य॑। अ॒हम्। स॒वि॒तुः। स॒वे। स॒त्यप्र॑सवस॒ इति॑ स॒त्यऽप्र॑सवसः। इन्द्र॑स्य। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम्। नाक॑म्। अ॒रु॒ह॒म् ॥१०॥

Mantra without Swara
देवस्याहँ सवितुः सवे सत्यसवसो बृहस्पतेरुत्तमन्नाकँ रुहेयम् । देवस्याहँ सवितुः सवे सत्यसवस इन्द्रस्योत्तमन्नाकँ रुहेयम् । देवस्याहँ सवितुः सवे सत्यप्रसवसो बृहस्पतेरुत्तमन्नाकमरुहम् । देवस्याहँ सवितुः सवे सत्यप्रसवस इन्द्रस्योत्तमन्नाकमरुहम् ॥

देवस्य। अहम्। सवितुः। सवे। सत्यसवस इति सत्यऽसवसः। बृहस्पतेः। उत्तममित्युत्ऽतमम्। नाकम्। रुहेयम्। देवस्य। अहम्। सवितुः। सवे। सत्यसवस इति सत्यऽसवसः। इन्द्रस्य। उत्तममित्युत्ऽतमम्। नाकम्। रुहेयम्। देवस्य। अहम्। सवितुः। सवे। सत्यप्रसवस इति सत्यऽप्रसवसः। बृहस्पतेः। उत्तममित्युत्ऽतमम्। नाकम्। अरुहम्। देवस्य। अहम्। सवितुः। सवे। सत्यप्रसवस इति सत्यऽप्रसवसः। इन्द्रस्य। उत्तममित्युत्ऽतमम्। नाकम्। अरुहम्॥१०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे प्रजा जन और राजपुरुषो ! जैसे (अहम्) मैं समाध्यक्ष राजा (सत्यसवसः) जगत् के कारण-कार्य रूप सत्य ऐश्वर्य वाले (देवस्य) सर्वत्र प्रकाशमान (बृहस्पतेः) बृहत्=प्रकृति आदि के पालक (सवितु:) सकल जगत् के उत्पादक जगदीश्वर के (सवे) उत्पन्न किये इस जगत् में (उत्तमम्) सर्वथा उत्कृष्ट (नाकम्) दुःख रहित सब्र सुखों से युक्त ईश्वरस्वरूप मोक्षपद को (रुहेयम्) प्राप्त करता हूँ--
हे राजा के मन्त्री लोगो ! जैसे (अहम्) मैं परोपकारी पुरुष (सत्यसवसः) सत्य और न्याय से युक्त (देवस्य) सब सुखों के दाता (सवितु:) सकल ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाले (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्यवान् सम्राट् के (सवे) ऐश्वर्य में (उत्तमम्) प्रशस्त (नाकम्) दुःख रहित भोग को (रुहेयम्) प्राप्त करता हूँ--
है विद्या से प्रेम करने वाले छात्र और अध्यापक लोगो ! जैसे (अहम्) मैं विद्याभिलाषी (सत्य- प्रसवसः) सत्य=अविनाशी बोध को उत्पन्न करने वाले (सवितु:) समग्र विद्याबोध के उत्पादक (देवस्य) सब विद्या आदि शुभ गुण कर्म स्वभावों को प्रकाशित करने वाले (बृहस्पतेः) वेदवाणी के पालक आचार्य के (सवे) विद्याप्रचार रूप ऐश्वर्यमें (उत्तमम्) प्रशस्त (नाकम्) सब दुःखों के विनाशक आनन्द को (अरुहम्) प्राप्त कर चुका हूँ--
हे विजय की कामना करने वाले वीर योद्धाओ ! जैसे (अहम्) मैं योद्धा (सत्यप्रसवसः) सत्य=न्याय, विजय आदि को प्रकाशित करने वाले (देवस्य) धनुर्वेद आदि युद्ध विद्या को प्राप्त कराने वाले (सवितु:) शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले (इन्द्रस्य) दुष्ट शत्रुओं का विदारण करने वाले सेनाध्यक्ष की (सवे) प्रेरणा में (उत्तमम्) श्रेष्ठ (नाकम्) सब सुखों को देने वाले विजय को (अरुहम्) प्राप्त कर चुका हूँ, वैसे तुम भी प्राप्त करो ॥ ९ । १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। राजपुरुष और प्रजाजन परस्पर अविरोध से ईश्वर, चक्रवर्ती राज्य और सकल विद्याओं का संसेवन करके सब उत्तम सुखों को प्राप्त करें और करावें ॥ ९ । १० ॥
Subject
मनुष्य लोगों को उचित है कि विद्वानों का अनुकरण करें मूढों का नहीं, यह उपदेश किया है॥
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ ।१। ५ । २-५) में गई है ॥९ । १० ॥
Commentary Essence
१.मनुष्य विद्वानों का ही अनुकरण करें; मूढ़ों का नहीं--जगदीश्वर सच्चे ऐश्वर्य वाला है अर्थात् उसके रचे जगत् के कारण और कार्य सत्य हैं, वह सर्वत्र प्रकाशमान है, वह प्रकृति आदि का पालक है, उस जगदीश्वर के उत्पन्न किये इस संसार में सभाध्यक्ष विद्वान राजा सर्वथा उत्कृष्ट, दुःखरहित, सब सुखों से युक्त मोक्ष को प्राप्त करे। राजपुरुष तथा प्रजाजन सम्राट् का अनुकरण करें।
सम्राट सत्य और न्याय से युक्त हो, सब सुखों का दाता हो, सकल ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाला हो, परम ऐश्वर्य से युक्त हो। उसके ऐश्वर्यसम्पन्न राज्य में परोपकारी विद्वान् उत्तम दुःखरहित भागों को प्राप्त करता है। राजपुरुष और मन्त्रिगण उक्त परोपकारी विद्वान् का अनुकरण करें।
बृहस्पति=वेदवाणी के पालक विद्वान का ज्ञान सत्य और प्रत्यक्ष होता है, वह सकल विद्याओं के बोध का उत्पादक है, सब विद्या तथा शुभ गुण, कर्म, स्वभाव का प्रकाशक है। विद्या का जिज्ञासु उस बृहस्पति विद्वान के विद्याप्रचार रूप ऐश्वर्य का सेवन करके उतम, सब दुःखों के विनाशक आनन्द को प्राप्त करता है। विद्या से प्रेम करने वाले छात्र और अध्यापक बृहस्पति और उक्त विद्या-जिज्ञासु का अनुसरण करें।
इन्द्र=दुष्ट शत्रुओं का विदारण करने वाला सेनापति सत्य अर्थात् न्याय और विजय आदि का उत्पादक तथा धनुर्वेदादि में प्रतिपादित युद्धविद्या का प्रापक, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला होता है। सब सैनिक उसकी प्रेरणा (आज्ञा) में रह कर सब सुखों को प्रदान करने वाले विजय को प्राप्त करें। विजय की आकांक्षा करने वाले योद्धा उनका अनुकरण करें।
२. अलङ्कार--मन्त्र में उपमावाचक शब्द लुप्त है, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि प्रजाजन और राजपुरुष सभाध्यक्ष राजा आदि के समान आचरण करें ॥ ९ । १० ॥