Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 6

63 Mantra
8/6
Devata- गृहपतयो देवताः Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वा॒मम॒द्य स॑वितर्वा॒ममु श्वो दि॒वेदि॑वे वा॒मम॒स्मभ्य॑ꣳ सावीः। वा॒मस्य॒ हि क्षय॑स्य देव॒ भूरे॑र॒या धि॒या वा॑म॒भाजः॑ स्याम॥६॥

वा॒मम्। अ॒द्य। स॒वि॒तः॒। वा॒मम्। ऊँ॒ऽइत्यूँ॑। श्वः। दि॒वेदि॑व॒ इति॑ दि॒वेऽदि॑वे। वा॒मम्। अ॒स्मभ्य॑म्। सा॒वीः। वा॒मस्य॑। हि। क्षय॑स्य। दे॒व॒। भूरेः॑। अ॒या। धि॒या। वाम॑भाज॒ इति॑ वाम॒ऽभाजः॑। स्या॒म॒ ॥६॥

Mantra without Swara
वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवेदिवे वाममस्मभ्यँ सावीः । वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम ॥

वामम्। अद्य। सवितः। वामम्। ऊँऽइत्यूँ। श्वः। दिवेदिव इति दिवेऽदिवे। वामम्। अस्मभ्यम्। सावीः। वामस्य। हि। क्षयस्य। देव। भूरेः। अया। धिया। वामभाज इति वामऽभाजः। स्याम॥६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (देव) सुखदायक, (सवितः) पुरुषार्थ से बहुत ऐश्वर्य को देने वाले एवं सब ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाले ईश्वर ! आप हमारे लिये (अद्य) आज (वामम्) प्रशंसनीय सुख, (उ) और (श्वः) कल (वामम्) प्रशंसनीय सुख, अथवा (दिवे दिवे) प्रतिदिन (वामम्) प्रशंसनीय सुख (सावी:) उत्पन्न कीजिये, जिससे हम लोग (अया) इस (धिया) उत्तम बुद्धि से, (भूरेः) बहुत पदार्थों से युक्त (वामस्य) अत्युत्तम (क्षयस्य) गृहाश्रम में (वामभाजः) उत्तम कर्मों का सेवन करने वाले (हि) निश्चय से (स्याम) हों ॥ ८ । ६ ॥
Essence
गृहस्थ जन ईश्वर के अनुग्रह, परम पुरुषार्थ और प्रशस्त बुद्धि से मङ्गलकारी गृहाश्रमी बन कर इस प्रकार प्रयत्न करें कि जिससे तीनों कालों में अत्यन्त सुखी रहें ॥ ८ । ६ ॥
Subject
फिर गृहस्थों को किस प्रकार प्रयत्न करना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।।
Refrences
यहाँ (सावीः) सब। यहाँ लोट् अर्थ में लुङ् और अट् का अभाव है। (अया) अनया। यहाँ'छन्दसो वर्णलोपश्च' (अ०८ । २ । २५) इस भाष्य वार्तिक से 'न' का लोप है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४ । ४ । १ । ६) में की गई है ॥ ८ । ६ ॥
Commentary Essence
गृहाश्रमी कैसा प्रयत्न करें-- गृहपति प्रथम ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना करें कि हे सब सुखों के दाता, पुरुषार्थ से सब ऐश्वर्य के उत्पादक जगदीश्वर! आप हमारे लिये आज, कल, प्रतिदिन अर्थात् तीनों कालों में प्रशस्त सुख को उत्पन्न कीजिये। जिससे हम लोग इस श्रेष्ठ बुद्धिसे नाना पंदार्थों से भूषित, अत्युत्तम गृहाश्रम में उत्तम कर्मों को सेवन करने वाले हों।
गृहस्थ लोग जैसी ईश्वर से प्रार्थना करें वैसा ही उसकी प्राप्ति में परम पुरुषार्थ भी किया करें। ईश्वर के अनुग्रह, अपने परम पुरुषार्थ और प्रशस्त बुद्धि से उत्तम कर्मों के सेवन करने से सुख की अभिवृद्धि होती है ।। ८ । ६ ॥