Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 50

63 Mantra
8/50
Devata- प्रजापतयो देवताः Rishi- देवा ऋषयः Chhand- भूरिक् आर्षी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ॒शिक् त्वं दे॑व सोमा॒ग्नेः प्रि॒यं पाथोऽपी॑हि व॒शी त्वं दे॑व सो॒मेन्द्र॑स्य प्रि॒यं पाथोऽपी॑ह्य॒स्मत्स॑खा॒ त्वं दे॑व सोम॒ विश्वे॑षां दे॒वानां॑ प्रि॒यं पाथोऽपी॑हि॥५०॥

उ॒शिक्। त्वम्। दे॒व॒। सो॒म॒। अ॒ग्नेः। प्रि॒यम्। पाथः॑। अपि॑। इ॒हि॒। व॒शी। त्वम्। दे॒व। सो॒म॒। इन्द्र॑स्य। प्रि॒यम्। पाथः॑। अपि॑। इ॒हि॒। अ॒स्मत्स॒खेत्य॒स्मत्ऽसखा॑। त्वम्। दे॒व॒। सो॒म॒। विश्वे॑षाम्। दे॒वाना॑म्। प्रि॒यम्। पाथः॑। अपि॑। इ॒हि॒ ॥५०॥

Mantra without Swara
उशिक्त्वन्देव सोमाग्नेः प्रियम्पाथो पीहि वशी त्वन्देव सोमेन्द्रस्य प्रियम्पाथो पीह्यस्मत्सखा त्वन्देव सोम विश्वेषान्देवानाम्प्रियम्पाथो पीहि ॥

उशिक्। त्वम्। देव। सोम। अग्नेः। प्रियम्। पाथः। अपि। इहि। वशी। त्वम्। देव। सोम। इन्द्रस्य। प्रियम्। पाथः। अपि। इहि। अस्मत्सखेत्यस्मत्ऽसखा। त्वम्। देव। सोम। विश्वेषाम्। देवानाम्। प्रियम्। पाथः। अपि। इहि॥५०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (देव) दिव्य गुणों से युक्त (सोम) सकल ऐश्वर्य से भरपूर राजन् ! आप (उशिक्) कामना करते हुये (अग्नेः) श्रेष्ठ विद्वान् के (प्रियम्) प्रीतिकारक (पाथः) रक्षा के योग्य आचरण को (अपि+इहि) निश्चय से प्राप्त करो वा जानो।
हे (देव) दाता (सोम) ऐश्वर्य की उन्नति के लिये प्रेरणा करने वाले राजन् ! आप (वशी) जितेन्द्रिय होकर (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य से युक्त धार्मिक राजा के (प्रियम्) सुखों से तृप्त करने वाले (पाथः) ज्ञातव्य कर्म को (अपि+इहि) निश्चय से प्राप्त करो वा जानो ।
हे (देव) सब विद्याओं में प्रकाशमान (सोम) विद्या रूप ऐश्वर्य से युक्त राजन् ! आप (अस्मत्सखा) हमारे सखा बनकर (विश्वेषाम्) सब (देवानाम्) धार्मिक आप्त विद्वानों के (प्रियम्) कामना के योग्य (पाथः) विज्ञानमय आचरण को (अपि+इहि) निश्चय से प्राप्त करो वा जानो ॥ ८।५०॥
Essence
राजा, राजपुरुष, और सभासदोंको उचित है कि वे पुरुषार्थ, संयम और मित्रता से धार्मिक वेदज्ञ विद्वानों के मार्ग पर चलें क्योंकि सत्पुरुषों के संग और अनुकरण के बिना कोई भी विद्या, धर्म, सब जनों के प्रेम और ऐश्वर्य को प्राप्त नहीं कर सकता ॥ ८ । ५० ॥
Subject
प्रकारान्तर से राजविषय का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
(पाथः) यह शब्द निघं० (४ । ३) में पद नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (११।५। ९। १२) में की गई है ॥ ८। ५० ॥
Commentary Essence
गृहस्थों को राजविषयक उपदेश--प्रजा जन राजा से कहते हैं कि हे राजन् ! आप दिव्य गुणों से सम्पन्न हो, सकल ऐश्वर्य से भरपूर हो, प्रजा की कामना करने वाले हो, इसलिये श्रेष्ठ विद्वानों के प्रीतिकारक आचरण का पुरुषार्थ से अनुकरण करो। आप दाता हो और हमें ऐश्वर्य की उन्नति के लिये प्रेरित करने वाले हो। आप संयम से जितेन्द्रिय होकर परम ऐश्वर्य से युक्त धार्मिक राजाओं के, सुखों से तृप्त करने वाले कर्मों का अनुकरण करो। आप सब विद्याओं में प्रकाशमान हो, विद्या रूप ऐश्वर्य से भूषित हो इसलिये मित्रता से हम सब जनों के सखा होकर धार्मिक, वेद के पारंगत, आप्त विद्वानों के प्रिय विज्ञान को प्राप्त करो क्योंकि सत्पुरुषों के संग और सत्पुरुषों के अनुकरण के बिना कोई भी व्यक्ति विद्या, धर्म और ऐश्वर्य को प्राप्त नहीं कर सकता और न ही सब जनों का प्रिय हो सकता है ॥ ८ । ५० ।।