Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 5

63 Mantra
8/5
Devata- गृहपतयो देवताः Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- प्राजापत्या अनुष्टुप्,निचृत् आर्षी जगती Swara- निषादः, गान्धारः
Mantra with Swara
विव॑स्वन्नादित्यै॒ष ते॑ सोमपी॒थस्तस्मि॑न् मत्स्व। श्रद॑स्मै नरो॒ वच॑से दधातन॒ यदा॑शी॒र्दा दम्प॑ती वा॒मम॑श्नु॒तः। पुमा॑न् पु॒त्रो जा॑यते वि॒न्दते॒ वस्वधा॑ वि॒श्वाहा॑र॒पऽए॑धते गृ॒हे॥५॥

विव॑स्वन्। आ॒दि॒त्य॒। ए॒षः। ते॒। सो॒म॒पी॒थ इति॑ सोमऽपी॒थः। तस्मि॑न्। म॒त्स्व॒। श्रत्। अ॒स्मै॒। न॒रः। वच॑से। द॒धा॒त॒न॒। यत्। आ॒शी॒र्देत्या॑शीः॒ऽदा। दम्प॑ती॒ इति॒ दम्ऽप॑ती। वा॒मम्। अश्नु॒तः। पुमा॑न्। पु॒त्रः। जा॒य॒ते॒। वि॒न्दते॑। वसु॑। अध॑। वि॒श्वाहा॑। अ॒र॒पः। ए॒ध॒ते॒। गृ॒हे ॥५॥

Mantra without Swara
विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथस्तस्मिन्मत्स्व श्रदस्मै नरो वचसे दधातन यदाशीर्दा दम्पती वाममश्नुतः । पुमान्पुत्रो जायते विन्दते वस्वधा विश्वाहारप एधते गृहे ॥

विवस्वन्। आदित्य। एषः। ते। सोमपीथ इति सोमऽपीथः। तस्मिन्। मत्स्व। श्रत्। अस्मै। नरः। वचसे। दधातन। यत्। आशीर्देत्याशीःऽदा। दम्पती इति दम्ऽपती। वामम्। अश्नुतः। पुमान्। पुत्रः। जायते। विन्दते। वसु। अध। विश्वाहा। अरपः। एधते। गृहे॥५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (विवस्वन्) विविध प्रकार के स्थान में रहने वाले (आदित्य) अविनाशी स्वरूप विद्वान् गृहस्थ ! (एषः) यह (ते) तेरा (सोमपीथः) जो सोमपान का स्थान गृहाश्रम है (तस्मिन्) उस गृहाश्रम में तू (विश्वाहा) बहुत दिन तक (मत्स्व) हर्षित एवं आनन्दित रह।
हे [नरः] गृहस्थ धर्म को प्राप्त करने वाले गृहस्थ लोगो ! तुम (अस्मै) इस (वचसे) गृहाश्रम सम्बन्धी वाग्य्रवहार के लिये (श्रत्) सत्य को (दधातन) धारण करो।
(यद्) जिस घर में (दम्पती) स्त्री-पुरुष (वामम्) प्रशंसनीय गृहाश्रम धर्म को (अश्नुतः) प्राप्त होते हैं (तस्मिन्) उस घर में (आशीर्दा:) इच्छा पूरी करने वाला (अरप:) निष्पाप (पुमान्) पुल्लिङ्ग (पुत्रः) वृद्धावस्था के दुःख रूप नरक से रक्षा करने वाला पुत्र (जायते) उत्पन्न होता है, (वसु) धन (विन्दते) प्राप्त होता है और (एधते) धन बढ़ता है ॥८ । ५ ॥
Essence
स्त्री-पुरुष अति प्रेम से परस्पर परीक्षापूर्वक स्वयं विवाह करके, सत्याचरण से सन्तानों को उत्पन्न कर महान् ऐश्वर्य की प्राप्ति कर, नित्य सुख को बढ़ाया करें ॥ ८ । ५ ॥
Subject
गृहस्थ धर्म का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
(श्रत्) 'श्रत्' शब्द (निघं० ३-१०) में सत्य-नामों में पढ़ा है । (यत्) यहाँ'सुपां सुलुक्०' (अ० ७ । १ । ३९) सूत्र से सुप् का लुक हुआ है । (वामम्) 'वाम' शब्द (निघं० ३ । ८) में प्रशस्य-नामों में पढ़ा है। (अधा) यहाँ'पृषोदरादि’ मानकर धकार के स्थान पर धकार हो गया। और 'निपातस्य च' (अ० ६ । ३ । १३६) सूत्र से दीर्घ हुआ है। (विश्वाहा) यहाँ 'शेश्छन्दसि बहुलम्' ( अ० ६ । १ । ७०) सूत्र से शि प्रत्यय का लुक् (अदर्शन) हुआ है। और विश्व शब्द (निघं० ३ । १) में बहुवाचकशब्दों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या (शत०४ । ३ । ५ । १६-२४ तथा ४ ।४।४।१-५) में की है। पुत्र शब्द का अर्थ मनुस्मृति (अ० ९ श्लो० १३८) में इस प्रकार किया है:--
क्योंकि पुम् नामक नरक (वृद्धावस्थाजन्यदुःखादि) से पितादि की रक्षा करता है। इसलिये सन्तान को स्वयंभू मनु ने स्वयं पुत्र कहा है ।
Commentary Essence
गृहस्थ-धर्म--यह गृहाश्रम गृहपति के लिये सोमपान करने का स्थान है। अतः गृहपति सदा इस गृहाश्रम में आनन्दित रहे। गृहस्थों का धर्म यह है कि वे गृहाश्रम सम्बन्धी वाग्व्यवहार में सदा सत्य को धारण करें, मिथ्याभाषण कभी न करें। जिस घर में स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर इस सत्यभाषण रूप प्रशस्त गृहाश्रम धर्म का पालन करते हैं उस घर में माता-पिता की इच्छा को पूर्ण करने वाले आज्ञाकारी धर्मात्मा (निष्पाप) पुत्र उत्पन्न होते हैं,जो माता-पिता की वृद्धावस्था से उत्पन्न दुःख (नरक) से रक्षा करते हैं। उन्हें महान् ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। उनका ऐश्वर्य बढ़ता है। वे नित्य सुख को बढ़ाते हैं ।। ८ । ५ ।।