Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 49

63 Mantra
8/49
Devata- विश्वेदेवा प्रजापतयो देवताः Rishi- देवा ऋषयः Chhand- विराट प्राजापत्या जगती,निचृत् आर्षी उष्णिक्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क॒कु॒भꣳ रू॒पं वृ॑ष॒भस्य॑ रोचते बृ॒हच्छु॒क्रः शु॒क्रस्य॑ पुरो॒गाः सोमः॒ सोम॑स्य पुरो॒गाः। यत्ते॑ सो॒मादा॑भ्यं॒ नाम॒ जागृ॑वि॒ तस्मै॑ त्वा गृह्णामि॒ तस्मै ते सोम॒ सोमा॑य॒ स्वाहा॑॥४९॥

क॒कु॒भम्। रू॒पम्। वृ॒ष॒भस्य॑। रो॒च॒ते॒। बृ॒हत्। शुक्रः। शु॒क्रस्य॑। पु॒रो॒गा इति॑ पुरः॒ऽगाः। सोमः॑। सोम॑स्य। पु॒रो॒गा इति॑ पुरः॒ऽगाः। यत्। ते॒। सो॒म॒। अदा॑भ्यम्। नाम॑। जागृ॑वि। तस्मै॑। त्वा॒। गृ॒ह्णा॒मि॒। तस्मै॑। ते॒। सोम॑। सोमा॑य। स्वाहा॑ ॥४९॥

Mantra without Swara
ककुभँ रूपँ वृषभस्य रोचते बृहच्छुक्रः शुक्रस्य पुरोगाः सोमः सोमस्य पुरोगाः । यत्ते सोमादाभ्यन्नाम जागृवि तस्मै त्वा गृह्णामि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा ॥

ककुभम्। रूपम्। वृषभस्य। रोचते। बृहत्। शुक्रः। शुक्रस्य। पुरोगा इति पुरःऽगाः। सोमः। सोमस्य। पुरोगा इति पुरःऽगाः। यत्। ते। सोम। अदाभ्यम्। नाम। जागृवि। तस्मै। त्वा। गृह्णामि। तस्मै। ते। सोम। सोमाय। स्वाहा॥४९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) ऐश्वर्यवान् विद्वान् पुरुष! यदि इस (वृषभस्य) सुख की वर्षा करने वाले सभापति का (बृहत्ककुभम्) दिशा के समान शुद्ध रूप (रोचते) प्रकाशित होता है तो आप (शुक्रस्य) शुद्ध धर्म का (पुरोगाःशुक्रः) विशुद्ध नेता बनो तथा (सोमस्य) ऐश्वर्य से युक्त गृहाश्रम का (पुरोगाः सोमः) सोम के गुणों से युक्त नेता बनो।
और जो (ते) तेरी (अदाभ्यम्) अमर (नाम) ख्याति (जागृवि) जागरूक है, उस ख्याति के कारण (त्वा) आपको सभापति स्वीकार करता हूँ।
हे (सोम) शुभ कर्मों में प्रेरणा करने वाले सभापते ! उक्त गुणों से युक्त (सोमाय) शुभ कर्मों में लगे हुये (ते) आपके लिये (स्वाहा) सत्य वेदवाणी हो ॥ ८ । ४९ ।।
Essence
सभा और प्रजा जनों को योग्य है कि वे जिसकी पुण्य प्रशंसा, सुन्दरता से युक्त रूप, विद्या, न्याय, विनय, शौर्य, तेज, पक्षपात का अभाव, मित्रता, उत्साह, नीरोगता, बल, पराक्रम, धैर्य, जितेन्द्रियता, वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा और प्रजा के पालन में प्रीति होवे उसी को सभापति राजा मानें ॥ ८ । ४९ ॥
Subject
अब फिर गृहस्थों को राजपक्ष में उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (११ । ५ । ९। १०-११) में की गई है ।। ८ । ४९ ।।
Commentary Essence
गृहस्थों को राजपक्षीय उपदेश--सभा और प्रजा के जन कहते हैं कि हे ऐश्वर्य को प्राप्त विद्वान् सभापते! आप सुख की वर्षा करने वाले हो, दिशाओं के समान आपका शुद्धरूप है अर्थात् आप सुन्दर रूपवान् हो, आप शुद्ध धर्म के नेता अर्थात् विद्या, न्याय, विनय, शौर्य, तेज, पक्षपात से शून्य इन शुद्ध गुणों से भूषित हो, ऐश्वर्य गुण से युक्त गृहाश्रम के भी नेता अर्थात् मित्रता, उत्साह, आरोग्य, बल, पराक्रम, धैर्य, जितेन्द्रियता इन सौम्य गुणों से अलङ्कृत हो, आपकी तिरस्काररहित ख्याति सर्वत्र जागरूक है अर्थात् आपकी पुण्य प्रशंसा है, आप सबको शुभ कर्मों में प्रेरित करने वाले और स्वयं शुभ कर्मों में प्रवृत्त हो, सत्यवाणी अर्थात् वेदादि शास्त्रों में आपकी श्रद्धा है, वेदानुकूल प्रजापालन में आपका प्रेम है, इसलिये हम आप को ही सभाधिपति राजा मानते हैं ।। ८ । ४९ ।।