Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 46

63 Mantra
8/46
Devata- विश्वकर्मेन्द्रो देवता Rishi- शास ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्,विराट आर्षी अनुष्टुप्, Swara- धैवतः, गान्धारः
Mantra with Swara
विश्व॑कर्मन् ह॒विषा॒ वर्ध॑नेन त्रा॒तार॒मिन्द्र॑मकृणोरव॒ध्यम्। तस्मै॒ विशः॒ सम॑नमन्त पू॒र्वीर॒यमुग्रो वि॒हव्यो॒ यथास॑त्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा विश्व॒क॑र्मणऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा वि॒श्वक॑र्मणे॥४६॥

विश्व॑कर्म॒न्निति॒ विश्व॑ऽकर्मन्। ह॒विषा॑। वर्द्ध॑नेन। त्रा॒तार॑म्। इन्द्र॑म्। अ॒कृ॒णोः॒। अ॒व॒ध्यम्। तस्मै॑। विशः॑। सम्। अ॒न॒म॒न्त॒। पू॒र्वीः। अ॒यम्। उ॒ग्रः। वि॒हव्य॒ इति॑ वि॒ऽहव्यः॑। यथा॑। अस॑त्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। इन्द्रा॑य। त्वा॒। वि॒श्वक॑र्मण॒ इति॑ वि॒श्वऽक॑र्मणे। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। इन्द्रा॑य। त्वा॒। वि॒श्वक॑र्मण॒ इति॑ वि॒श्वऽक॑र्मणे ॥४६॥

Mantra without Swara
विश्वकर्मन्हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम् । तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमुग्रो विहव्यो यथासत् । उपयामगृहीतो सीन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे ॥

विश्वकर्मन्निति विश्वऽकर्मन्। हविषा। वर्द्धनेन। त्रातारम्। इन्द्रम्। अकृणोः। अवध्यम्। तस्मै। विशः। सम्। अनमन्त। पूर्वीः। अयम्। उग्रः। विहव्य इति विऽहव्यः। यथा। असत्। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। इन्द्राय। त्वा। विश्वकर्मण इति विश्वऽकर्मणे। एषः। ते। योनिः। इन्द्राय। त्वा। विश्वकर्मण इति विश्वऽकर्मणे॥४६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (विश्वकर्मन्) सब उत्तम कर्मों से युक्त प्रजा आप (वर्द्धनेन) वृद्धि के निमित्त (हविषा) ग्रहण करने के योग्य न्याय से जिस (अवध्यम्) वध न करने के योग्य (इन्द्रम्) परमऐश्वर्य के दाता इन्द्र को (त्रातारम्) रक्षक (अकृणो:) बनाते हो, अतः आपको (पूर्वी:) पूर्वज धार्मिक जनों से शिक्षा को प्राप्त हुई (विशः) प्रजा (सम् अनमन्त) नमस्ते करती हैं।
जिस प्रकार (अयम्) यह सभा अधिकारी (उग्रः) दुष्टों के दलन करने में तेजस्वी तथा (विहव्यः) विविध साधनों वाला (असत्) हो वैसा आप उपाय करो ।
'उपयाम' इत्यादि मन्त्रांश का अन्वय पूर्ववत् समझें ।। ८ । ४६ ।।
Essence
इस संसार में कोई भी सब जगत् के रक्षक ईश्वर का और सभाध्यक्ष राजा का तिरस्कार न करे, किन्तु सब उनकी अनुमति के अनुसार बर्ताव करें।
प्रजा के विरोध से कोई भी राजा समृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। ईश्वर और राजा के आश्रय के बिना प्रजा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के साधक कर्मों को नहीं कर सकती, अतः राजा और प्रजा दोनों ईश्वर के आश्रय से एक-दूसरे के उपकार के लिये धर्मपूर्वक बर्ताव किया करें ॥ ८ । ४६ ॥
Subject
अब राजधर्म का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(अनमन्त) नमन्ते। यहाँ लट् अर्थ में लुङ् लकार है। (पूर्वीः) यहाँ पूर्वसवर्णआदेश है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४।६।४। ६) में की गई है ॥ ८ । ४६ ॥
Commentary Essence
राजधर्म--सब उत्तम कर्मों से युक्त प्रजाजन वृद्धि के हेतु एवं ग्रहण करने के योग्य न्यायाचरण से ईश्वर और सभाध्यक्ष को स्वीकार करें। इस संसार में ईश्वर और सभाध्यक्ष तिरस्कार करने योग्य नहीं हैं क्योंकि ये दोनों परम ऐश्वर्य के दाता और सब जगत् के रक्षक हैं। सब लोग इनकी अनुमति में रहें। जैसे सुशिक्षित धार्मिक पूर्वज लोग इनका सत्कार करते रहे हैं वैसे सब लोग सत्कार करें ।
प्रजा को योग्य है कि वह जिस प्रकार से यह सभाध्यक्ष राजा दुष्टों के दलन करने में तेजस्वी एवं विविध साधनों से सम्पन्न हो सके वैसा प्रयत्न करे, क्योंकि प्रजा के विरोध से कोई भी राजा कदापि समृद्ध नहीं हो सकता। ईश्वर और राजा के आश्रय के बिना प्रजा भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के साधक कार्यों को नहीं कर सकती, इसलिये राजा और प्रजा ईश्वर का आश्रय करके एक-दूसरे के उपकार के लिये धर्मपूर्वक बर्ताव किया करें ॥ ८ । ४६ ।।