Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 28

63 Mantra
8/28
Devata- दम्पती देवते Rishi- अत्रिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् साम्नी उष्णिक्,प्राजापत्या अनुष्टुप्, Swara- ऋषभः, गान्धारः
Mantra with Swara
एज॑तु॒ दश॑मास्यो॒ गर्भो॑ ज॒रायु॑णा स॒ह। यथा॒यं वा॒युरेज॑ति॒ यथा॑ समु॒द्रऽएज॑ति। ए॒वायं दश॑मास्यो॒ऽअस्र॑ज्ज॒रायु॑णा स॒ह॥२८॥

एज॑तु। दश॑मास्य॒ इति॒ दश॑ऽमास्यः। गर्भः॑। ज॒रायु॑णा। स॒ह। यथा॑। अ॒यम्। वा॒युः। एज॑ति। यथा॑। स॒मु॒द्रः। एज॑ति। ए॒व। अ॒यम्। दश॑मास्य॒ इति॒ दश॑ऽमास्यः। अस्र॑त्। ज॒रायु॑णा। स॒ह ॥२८॥

Mantra without Swara
एजतु दशमास्यो गर्भा जरायुणा सह । यथायँवायुरेजति यथा समुद्र एजति । एवायन्दशमास्यो ऽअस्रज्जरायुणा सह ॥

एजतु। दशमास्य इति दशऽमास्यः। गर्भः। जरायुणा। सह। यथा। अयम्। वायुः। एजति। यथा। समुद्रः। एजति। एव। अयम्। दशमास्य इति दशऽमास्यः। अस्रत्। जरायुणा। सह॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे स्त्री-पुरुषो ! जैसे यह वायु (एजति) चलता है और जैसे (समुद्रः) समुद्र (एजति) बढ़ता है वैसा (जरायुणा) जरायु के (सह ) साथ (दशमास्यः) दस महीनों में पूर्ण होने वाला (गर्भः) पुरुष से सेचन किया और स्त्री से ग्रहण किया हुआ गर्भ (एजतु) क्रम से बढ़े, इस प्रकार बढ़ता हुआ (अयम्) यह ( जरायुणा) जरायु के साथ (दशमासस्य:) दस मास में पूर्ण होकर ही (अस्रत्) नीचे को स्रवित हो, उत्पन्न हो । ८।२८॥
Essence
ब्रह्मचर्य से शरीर से पुष्ट, मन से सन्तुष्ट तथा विद्या वृद्धि से सम्पन्न विवाहित स्त्री-पुरुष यत्न से गर्भ की रक्षा करें जिससे वह गर्भ दस मास से पूर्व स्खलित न हो। जो दस मास के उपरान्त जन्म लेता है वह प्रायः बलवान् औरबुद्धिमान् होता है और जो उससे पूर्व उत्पन्न होता है वह वैसा नहीं होता ।। ८ । २८ ।।
Subject
अब गृहस्थ धर्म में गर्भ की व्यवस्था का उपदेश किया जाता है ॥
Refrences
(गर्भः) गर्भ शब्द का निर्वचन निरुक्त (१०-२३) में ग्रहणार्थक 'गृभ्' धातु से अथवा सेचनार्थक 'गॄ' धातु से माना हैं । (अस्रत्) यहाँ लोट् अर्थ में लङ् लकार है। इस मन्त्र की व्याख्या शत ० (४।५।२।४-९) में की गई है ॥ ८ । २८ ॥
Commentary Essence
गृहस्थधर्म में गर्भव्यवस्था— ब्रह्मचर्य सेवन से शरीर से पुष्ट, मन से सन्तुष्ट, विद्यावृद्धि से सम्पन्न विवाहित स्त्री-पुरुषों को योग्य है कि वे यत्न से गर्भ की रक्षा करें । सुरक्षित गर्भ वायु के समान गतिशील हो, समुद्र के समान बढ़े, जरायु के साथ क्रम से बढ़ता रहे, पूर्ण वृद्धि को प्राप्त हुआ गर्भ जरायु के साथ दस मास में ही स्रवित हो।जो गर्भ दस मास के उपरान्त जन्म लेता है वह प्रायः बलवान् और बुद्धिमान् होता है और जो इससे पूर्व उत्पन्न हो जाता है वह वैसा बलवान् और बुद्धिमान् नहीं होता ॥ ८ ॥ २८ ॥
Elsewhere Availablity
'एजतु दशमास्यो०' इस मन्त्र का विनियोग गर्भाधान संस्कार तथा जातकर्म संस्कार में किया गया है (संस्कारविधि) ॥ ८ । २८ ॥