Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 22

63 Mantra
8/22
Devata- गृहपतयो देवताः Rishi- अत्रिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् साम्नी बृहती,विराट आर्ची बृहती Swara- ऋषभः, मध्यमः
Mantra with Swara
यज्ञ॑ य॒ज्ञं ग॑च्छ य॒ज्ञप॑तिं गच्छ॒ स्वां योनिं॑ गच्छ॒ स्वाहा॑। ए॒ष ते॑ य॒ज्ञो य॑ज्ञपते स॒हसू॑क्तवाकः॒ सर्व॑वीर॒स्तं जु॑षस्व॒ स्वाहा॑॥२२॥

यज्ञ॑। य॒ज्ञम्। ग॒च्छ॒। य॒ज्ञप॑ति॒मिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। ग॒च्छ॒। स्वाम्। योनि॑म्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। ए॒षः। ते॒। य॒ज्ञः। य॒ज्ञ॒प॒त॒ इति॑ यज्ञऽपते। स॒हसू॑क्तवाक॒ इति॑ स॒हऽसू॑क्तवाकः। सर्व॑वीर॒ इति॒ सर्व॑ऽवीरः। तम्। जु॒ष॒स्व॒। स्वाहा॑ ॥२२॥

Mantra without Swara
यज्ञ यज्ञङ्गच्छ यज्ञपतिङ्गच्छ स्वाँयोनिङ्गच्छ स्वाहा । एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः सर्ववीरस्तञ्जुषस्व स्वाहा ॥

यज्ञ। यज्ञम्। गच्छ। यज्ञपतिमिति यज्ञऽपतिम्। गच्छ। स्वाम्। योनिम्। गच्छ। स्वाहा। एषः। ते। यज्ञः। यज्ञपत इति यज्ञऽपते। सहसूक्तवाक इति सहऽसूक्तवाकः। सर्ववीर इति सर्वऽवीरः। तम्। जुषस्व। स्वाहा॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (यज्ञ) शुभ कर्मों से संगत होने वाले गृहस्थ पुरुष! तू (स्वाहा) सत्य कर्म से (यज्ञम्) विद्वानों के सत्कार नामक गृहाश्रम के धर्म को (गच्छ) प्राप्त हो, (यज्ञपतिम्) सङ्ग करने के योग्य, गृहस्थ-जनों के पालक राजा को (गच्छ) प्राप्त हों, और (स्वाम्) अपने (योनिः) आत्मा के स्वभाव को (गच्छ) प्राप्त हो ।
हे (यज्ञपते) राजधर्म और अग्निहोत्र आदि के पालक गृहस्थ ! (ते) तेरा जो (एषः) यह (सहसूक्तवाकः) ऋग्वेद और यजुर्वेद के सूक्त एवं अनुवाकों से युक्त, (सर्ववीरः) सब वीरों को शरीर और आत्मा के बल से सुभूषित करने वाला, (यज्ञः) पूजा के योग्य प्रजा की रक्षा का निमित्त, विद्या का प्रचारक गृहाश्रम है, उसे तू (स्वाहा) सत्य और न्याय की प्रकाशक वाणी से (जुषस्व) सेवन कर ।। ८ । २२ ।।
Essence
प्रजा-जन गृहस्थ पुरुष प्रयत्न से घर के कार्य किया करें, राजभक्ति, राजाश्रय और धर्मयुक्त व्यवहार से गृहाश्रम का पालन करें ।
और—राजा श्रेष्ठ विद्या के प्रचार से सबका पोषण करे।। ८ । २२ ।।
Subject
गृहस्थों के लिए फिर विशेष उपदेश किया है।।
Refrences
(यज्ञ:) यहाँ औणादिक 'न' प्रत्यय है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४ । ४ । ४ । १४) में की गई है ।। ८ । २२ ।।
Commentary Essence
गृहस्थों के लिये विशेष उपदेश--श्रेष्ठ जनों के साथ सङ्गति रखने वाला गृहस्थ पुरुष यज्ञादि सत्य-कर्मों से विद्वानों के सत्कार रूप गृहाश्रम धर्म को प्राप्त करे। गृहाश्रमी जनों के पालक राजा को प्राप्त करे, राजा में भक्ति रखें एवं राजा का आश्रय ग्रहण करें। अपनी आत्मा के स्वभाव को प्राप्त करे अर्थात् उत्तम धर्मयुक्त व्यवहार करे। राजधर्म और अग्निहोत्र आदि के रक्षक राजा का गृहाश्रम ऋग्वेदादि के सूक्तों का प्रचारक हो, शारीरिक और आत्मिक बल से भूषित वीरों को उत्पन्न करने वाला हो, प्रजा का रक्षक और वेदविद्या के प्रचार का हेतु हो । ८। २२ ।।