Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 8 / Mantra 18

63 Mantra
8/18
Devata- गृहपतयो देवताः Rishi- अत्रिर्ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒गा वो॑ देवाः॒ सद॑नाऽअकर्म॒ यऽआ॑ज॒ग्मेदꣳ सव॑नं जुषा॒णाः। भ॑रमाणा॒ वह॑माना ह॒वीष्य॒स्मे ध॑त्त वसवो॒ वसू॑नि॒ स्वाहा॑॥१८॥

सु॒गेति॑ सु॒ऽगा। वः॒। दे॒वाः॒। सद॑ना। अ॒क॒र्म॒। ये। आ॒ज॒ग्मेत्या॑ऽज॒ग्म। इ॒दम्। सव॑नम्। जु॒षा॒णाः। भर॑माणाः। वह॑मानाः। ह॒वीꣳषि॑। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। ध॒त्त॒। व॒स॒वः॒। वसू॑नि। स्वाहा॑ ॥१८॥

Mantra without Swara
सुगा वो देवाः सदना अकर्म य आजग्मेदँ सवनञ्जुषाणाः । भरमाणा वहमाना हवीँष्यस्मे धत्त वसवो वसूनि स्वाहा ॥

सुगेति सुऽगा। वः। देवाः। सदना। अकर्म। ये। आजग्मेत्याऽजग्म। इदम्। सवनम्। जुषाणाः। भरमाणाः। वहमानाः। हवीꣳषि। अस्मेऽइत्यस्मे। धत्त। वसवः। वसूनि। स्वाहा॥१८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वसवः) शुभ गुण-कर्मों में वास करने वाले (देवाः) व्यवहार कुशल विद्वानो! जो हम लोग (स्वाहा) श्रेष्ठ कर्म से (इदम्) इस (सवनम्) ऐश्वर्य को (जुषाणाः) सेवन (भरमाणाः) धारण (वहमानाः) प्राप्त करके (वः) तुम्हारे लिये जिन (सुगा) अच्छी प्रकार प्राप्त करने योग्य (सदना) घरों को तथा (हवींषि) देने और लेने योग्य (वसूनि) धनों को (अकर्म) उत्पन्न करें उन्हें आप (आजग्म) प्राप्त करो। (अस्मे) हमारे लिये उन्हें आप भी (धत्त) धारण करो ॥ ८।१८ ।।
Essence
जैसे पिता, पति, श्वशुर, सास, मित्र और स्वामी लोग नाना पदार्थों से पुत्र, पुत्री, स्त्री, मित्र और भृत्य जनों का पालन करके सुख प्रदान करते हैं वैसे पुत्र आदि भी इनकी सेवा किया करें ॥८।१८॥
Subject
घर के कार्यों का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
(सुगा) यहाँ 'शेश्छन्दसि बहुलम्' (अ० ६ । १ । ७०) सूत्र से शि का लुक् होता है। (अकर्म) यहाँ डुकृञ्धातु से लुङ् लकार में 'मन्त्रे घस०' (अ० २।४।८०) सूत्र से च्लि प्रत्यय का लुक् हुआ है। (अस्मे) यहाँ भ्यस् प्रत्यय के स्थान पर 'सुपां सुलुक्०' (अ० ७ । १ । ३९) सूत्र से शे आदेश हुआ है। (वसूनि) 'वसु' शब्द का निघण्टु में (नि० २ । १०) धन के नामों में पाठ है। इस मन्त्र की व्याख्या (शत० ४।४।४।१०) में व्याख्या की है। यास्क मुनि ने निरुक्त में (नि० १२ । ४२) इस मन्त्र की व्याख्या की है।
Commentary Essence
घर के कार्य--शुभ गुण-कर्मों में निवास करने वाले पिता, पति, श्वशुर, सास, मित्र, स्वामी आदि देव जनों के लिये पुत्र, पुत्री, स्त्री, मित्र, भृत्य आदि लोग श्रेष्ठ कर्मों से ऐश्वर्य को प्राप्त करें। अर्थात् ऐश्वर्य से देव-जनों की सेवा करें तथा देव-जन भी पुत्र आदि का पालन करके इन्हें सुख प्रदान करें। ऐश्वर्य से सुखदायक घरों का निर्माण करें। लेन-देन के योग्य धनों को प्राप्त करें तथा उन्हें बढ़ावें ॥ ८ । १८ ।।