Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 5

48 Mantra
7/5
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- आर्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒न्तस्ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी द॑धाम्य॒न्तर्द॑धाम्यु॒र्वन्तरि॑क्षम्। स॒जूर्दे॒वेभि॒रव॑रैः॒ ॒परै॑श्चान्तर्या॒मे म॑घवन् मादयस्व॥५॥

अ॒न्तरित्य॒न्तः। ते॒। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। द॒धा॒मि॒। अ॒न्तः। द॒धा॒मि॒। उ॒रु। अ॒न्तरि॑क्षम्। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वेभिः॑। अव॑रैः। परैः॑। च॒। अ॒न्त॒र्य्याम इत्य॑न्तःऽया॒मे। म॒घ॒वन्निति॑ मघऽवन्। मा॒द॒य॒स्व॒ ॥५॥

Mantra without Swara
अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधाम्यन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम् । सजूर्देवेभिरवरैः परैश्चान्तर्यामे मघवन्मादयस्व ॥

अन्तरित्यन्तः। ते। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। दधामि। अन्तः। दधामि। उरु। अन्तरिक्षम्। सजूरिति सऽजूः। देवेभिः। अवरैः। परैः। च। अन्तर्य्याम इत्यन्तःऽयामे। मघवन्निति मघऽवन्। मादयस्व॥५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (मघवन्) परम धनवान् के समान योगी ! मैं (ते) तेरे (अन्तः) अन्दर (द्यावापृथिवी) आकाश में स्थित सूर्य और भूमि के समान विज्ञान आदि पदार्थों को (दधामि) स्थापित करता हूँ तथा (उरु) पर्याप्त (अन्तरिक्षम्) मध्यवर्ती अवकाश को (अन्तः) शरीर के अन्दर (दधामि) स्थापित करता हूँ (सजूः) मित्र के समान आप (देवेभिः) अत्यन्त आप्त विद्वानों (अवरैः) निकृष्ट मनुष्यों (परैः) उत्तम ऐश्वर्य का व्यवहार करने वाले पुरुषों के साथ (अन्तर्यामे) आन्तरिक यम आदि योगाङ्गों से उत्पन्न आनन्द में वर्तमान होकर दूसरों को भी (मादयस्व) हर्षित करो ॥ ७ । ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥ ईश्वर उपदेश करता है कि संसार में जैसे और जितने पदार्थ हैं वे सब वैसे और उतने मेरे ज्ञान में वर्त्तमान हैं, योग विद्या से रहित मनुष्य उनको देख नहीं सकता, और ईश्वरोपासना के बिना कोई योगी नहीं हो सकता ॥ ७ । ५ ॥
Subject
अब ईश्वर जो योग में प्रथम ही प्रवृत्त होता है, उसके लिये विज्ञान का उपदेश करता है ॥
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४।१।२।१६) में की गई है ॥ ७ । ५ ॥
Commentary Essence
१. प्राथमकल्पिक योगी के लिये ईश्वर का उपदेश-- ईश्वर उपदेश करता है कि ब्रह्माण्ड में जितने भी पदार्थ जिस स्वरूप में हैं उन सब पदार्थों को मैं उसी स्वरूप में जानता हूँ। जैसे आकाश में सूर्य और भूमि को मैंने स्थापित किया है, वैसे हे योगी पुरुष! ब्रह्माण्ड के सब पदार्थों के विज्ञान को तेरे अन्दर स्थापित करता हूँ। तू योगी होने से उक्त पदार्थ-विज्ञान को ग्रहण कर सकता है और जो योगविद्या से रहित मनुष्य है, वह ब्रह्माण्ड के इन पदार्थों को यथार्थ रूप में नहीं देख सकता और मेरी उपासना के बिना कोई योगी भी नहीं हो सकता। तू मेरे मित्र के समान है। इसलिये आप (तू) विद्वानों, निम्न कोटि के मनुष्यों और उत्तम ऐश्वर्य का व्यवहार करने वाले जनों के साथ योगज आनन्द में रह तथा अन्यों को भी योग-आनन्द से प्रसन्न कर।
२. अलंकार - मन्त्र में उपमा-वाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त होने से वाचकलुतोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे ईश्वर सूर्य और पृथिवी को आकाश में स्थापित करता है, वैसे योगी के हृदयाकाश में सब पदार्थों के विज्ञान को स्थापित करता है। योगी ईश्वर के सखा के समान है ।। ७ । ५ ।।