Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 43

48 Mantra
7/43
Devata- अन्तर्यामी जगदीश्वरो देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्। यु॒यो॒ध्यस्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम॒ स्वाहा॑॥४३॥

अग्ने॑। नय॑। सु॒पथेति॑ सु॒ऽपथा॑। रा॒ये। अ॒स्मान्। विश्वा॑नि। दे॒व॒। व॒युना॑नि। वि॒द्वान्। यु॒यो॒धि। अ॒स्मत्। जु॒हु॒रा॒णम्। एनः॑। भूयि॑ष्ठाम्। ते॒। नम॑उक्ति॒मिति॒ नमः॑ऽउक्तिम्। वि॒धे॒म्। स्वाहा॑ ॥४३॥

Mantra without Swara
अग्ने नय सुपथा रायेऽअस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नमउक्तिँ विधेम स्वाहा ॥

अग्ने। नय। सुपथेति सुऽपथा। राये। अस्मान्। विश्वानि। देव। वयुनानि। विद्वान्। युयोधि। अस्मत्। जुहुराणम्। एनः। भूयिष्ठाम्। ते। नमउक्तिमिति नमःऽउक्तिम्। विधेम्। स्वाहा॥४३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) सबके प्रकाशक जगदीश्वर ! आप (राये) योग की सिद्धि के लिये (अस्मान्) हम योगी लोगों को (विश्वानि) सब (वयुनानि) योग के विज्ञानों को (सुपथा) योगमार्ग से (नय) प्राप्त कराओ। जिससे हम लोग (स्वाहा) अपनी सत्यवाणी वा वेदवाणी के द्वारा (ते) योगोपदेष्टा परमगुरु आपकी (भूयिष्ठाम्) अत्यन्त (नम उक्तिम्) नम्रतापूर्वक स्तुति (विधेम) करें।
हे (देव) योग-विद्या के दाता ! [विद्वान्] सब योग को जानने वाले जगदीश्वर! आप कृपा करके (जुहुराणम्) हमारे अन्तःकरण की कुटिलता को और (एनः) दुष्टता रूप अपराध को (अस्मत्) हम योगी जनों के पास से (युयोधि) दूर कीजिये ।। ७ । ४३ ।।
Essence
कोई भी पुरुष परमात्मा की सच्ची प्रेमभक्ति के बिना योगसिद्धि को प्राप्तनहीं कर सकता ! और जो सच्ची प्रेमभक्ति से योग बल के द्वारा परमेश्वर को स्मरण करता है उसे वह दयालु परमात्मा शीघ्र योगसिद्धि प्रदान करता है ।। ७ । ४३ ।।
Subject
अब ईश्वर की प्रार्थना का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४ । ३ । ४ । १२) में की गई है ॥ ७ । ४३ ।।
Commentary Essence
ईश्वर प्रार्थना--हे सबके प्रकाशक ईश्वर ! आप योगसिद्धि के लिये हम योगी जनों को सम्पूर्ण योगविज्ञान योगमार्ग से प्राप्त कराइये। जिससे हम सत्य भाषणादि युक्त अपनी वाणी से अथवा आपकी वेदवाणी से योग के उपदेष्टा परमगुरु आपकी बहुत प्रकार की नम्रतापूर्वक स्तुति करें ।
हे योग के प्रदाता देव ! आप सम्पूर्ण योग को जानने वाले हो, सो कृपा करके हमारे अन्तःकरण की कुटिलता और पाप को दूर कर दीजिये ।। ७ । ४३ ।।