Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 4

48 Mantra
7/4
Devata- मघवा देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- आर्षी उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽस्य॒न्तर्य॑च्छ मघवन् पा॒हि सोम॑म्। उ॒रु॒ष्य राय॒ऽएषो॑ यजस्व॥४॥

उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। अ॒न्तः। य॒च्छ॒। म॒घ॒व॒न्निति॑ मघऽवन्। पा॒हि॒। सोम॑म्। उ॒रु॒ष्य। रायः॑। आ। इषः॑। य॒ज॒स्व॒ ॥४॥

Mantra without Swara
उपयामगृहीतो स्यन्तर्यच्छ मघवन्पाहि सोमम् । उरुष्य राय एषो यजस्व ॥

उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। अन्तः। यच्छ। मघवन्निति मघऽवन्। पाहि। सोमम्। उरुष्य। रायः। आ। इषः। यजस्व॥४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे योग के जिज्ञासु ! जिससे तू (उपयामगृहीतः) यमों को ग्रहण करने वाले के तुल्य (असि) है, इसलिये (अन्तः) अन्दर विद्यमान प्राण आदि का (यच्छ) निग्रह कर।
हे (मघवन्) परम पूज्य धनी के समान! तू (सोमम्) योग-सिद्ध ऐश्वर्य की (पाहि) रक्षा कर, (उरुष्य) अत्यन्त योगाभ्यास से अविद्या आदि क्लेशों का अन्त कर तथा (रायः) ऋद्धि-सिद्धि रूप धनों और (इष:) इच्छासिद्धियों को (आ-यजस्व) सब ओर से सिद्ध कर ॥ ७ । ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥ योग का जिज्ञासु यम आदि योग केअङ्गों से चित्त आदि का निरोध करके, अविद्याआदि दोषों को हटा कर संयम से ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करे ॥ ७ । ४॥
Subject
फिर मन से आत्मा के बीच में कैसे प्रयत्न करे, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
(उरुष्य) 'उरु' शब्द के उपपद रहते अन्तकर्म अर्थ वाली 'षो' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय और इसके नाम-धातु होने से पुन: 'क्विप्' प्रत्यय है तथा उससे फिर मध्यम पुरुष के एकवचन का यह प्रयोग बना है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४।१।१।१५) में की गई है ॥ ७ । ४ ।।
Commentary Essence
१. जीवात्मा का आन्तरिक प्रयत्न--योग का जिज्ञासु आत्मा यम आदि योग के अङ्गों से चित्त का निरोध करने वाले योगी के समान होकर अन्दर विद्यमान प्राण आदि का निग्रह करे अर्थात् प्राण आदि को वश में करे। जैसे धनवान् पुरुष पूजा के योग्य होता है, इसी प्रकार योगसिद्धि रूप धन से सम्पन्न योगी भी परम पूज्य है। क्योंकि वह योग-सिद्ध ऐश्वर्य की रक्षा करता है, योगाभ्यास से अविद्या आदि क्लेशों का अन्त करता है, ऋद्धि-सिद्धि रूप धनों को तथा कामना-सिद्धि को प्राप्त करता है। यह सब जीवात्मा के आन्तरिक प्रयत्न से सम्भव है ।।
२. अलङ्कार--मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त होने से वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि योग का जिज्ञासु पुरुष यम आदि योग के अङ्गों से चित्तवृत्ति का निरोध करने वाले योगी के समान बने, तथा जैसे धनवान् पुरुष पूज्य होता है वैसे योग-सिद्धि रूप धन से सम्पन्न योगी भी लोक में परम पूज्य बने।
३. योग के अङ्ग--१. यम- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह । २. नियम- शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर- प्राणिधान । ३. आसन । ४. प्राणायाम । ५. प्रत्याहार । ६. धारणा । ७. ध्यान । ८. समाधि । ९. संयम ।
४. ऋद्धि-सिद्धि - १. अणिमा। २. लघिमा। ३. महिमा।४. प्राप्ति । ५. प्राकाम्य। ६. वशित्व । ७. ईशित्व । ८. जहाँ कामावसायित्व वहां सत्यसङ्कल्पतः । ये आठ ऋद्धियाँ हैं। इनकी विशेष व्याख्या योग-दर्शन व्यासभाष्य में देख लेवें ।
१. ऊह (तारतार) । २. शब्द (सुतार) । ३. अध्ययन (तार) । ४. आध्यात्मिक दुःखों का विघात (प्रमोद) । ५. आधिभौतिक दुःखों का विघात (मुदित) । ६. आधिदैविक दुःखों का विघात (मोदमान) । ७. सुहृत्प्राप्ति (रम्यक) । ८. दान (सदामुदित)। ये आठ सिद्धियाँ हैं, इनकी विशेष व्याख्या सांख्य में देख लेवें ॥ ७ । ४ ॥