Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 28

48 Mantra
7/28
Devata- यज्ञपतिर्देवता देवता Rishi- देवश्रवा ऋषिः Chhand- ब्राह्मी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ॒त्मने॑ मे वर्चो॒दा वर्च॑से पव॒स्वौज॑से मे वर्चो॒दा वर्च॑से पव॒स्वायु॑षे मे वर्चो॒दा वर्च॑से पवस्व॒ विश्वा॑भ्यो मे प्र॒जाभ्यो॑ वर्चो॒दसौ॒ वर्च॑से पवेथाम्॥२८॥

आ॒त्मने॑। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। ओज॑से। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। आयु॑षे। मे॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। वर्च॑से। प॒व॒स्व॒। विश्वा॑भ्यः। मे॒। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑। व॒र्चो॒दसा॒विति॑ वर्चः॒ऽदसौ॑। वर्च॑से। प॒वे॒था॒म् ॥२८॥

Mantra without Swara
आत्मने मे वर्चादा वर्चसे पवस्वौजसे मे वर्चादा वर्चसे पवस्वायुषे मे वर्चादा वर्चसे पवस्व विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चादसौ वर्चसे पवेथाम् ॥

आत्मने। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। ओजसे। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। आयुषे। मे। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वर्चसे। पवस्व। विश्वाभ्यः। मे। प्रजाभ्य इति प्रऽजाभ्यः। वर्चोदसाविति वर्चःऽदसौ। वर्चसे। पवेथाम्॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वर्चोदा:) योग और ब्रह्मविद्या को देने वाले विद्वान् ! तू (मे) मेरे (आत्मने) इच्छा आदि गुणों से युक्त अपने स्वरूप को और (वर्चसे) अपने आत्मा के प्रकाश को (पवस्व) प्राप्त कर और करा ।
हे (वर्चोदाः) विद्या प्रदान करने वाले विद्वान् ! तू (मे) मेरे (ओजसे) आत्मबल और (वर्चसे) योग बल के प्रकाश को (पवस्व) जान और जना ।
हे (वर्चोदा:) बल देने वाले विद्वान् ! तू (मे)मेरे (आयुषे) जीवन और (वर्चसे) रोगापहारक औषध को (पवस्व) प्राप्त कर और करा ।
हे (वर्चोदसौ) न्याय के प्रकाशक, सब के अधिष्ठाता, सभापति न्यायाधीश के समान योगारूढ़ योग जिज्ञासु पुरुषो ! तुम (मे) मेरी (विश्वाभ्यः) समस्त (प्रजाभ्यः) प्रजा के लिये (वर्चसे) सद्गुण के प्रकाश को (पवेथाम्) प्राप्त करो और कराओ॥ ७ । २८ ।।
Essence
योग के बिना कोई भी मनुष्य पूर्ण विद्यावान् नहीं होता और पूर्ण विद्वत्ता के बिना आत्मा और परमात्मा का बोध किसी प्रकार नहीं हो सकता, और इस बोध के बिना सत्पुरुष के समान कोई प्रजा का पालन नहीं कर सकता, अतः योगविद्या का सब सेवन करें।। ७।२८॥
Subject
पठन-पाठन रूप यज्ञ का फिर उपदेश किया है ॥
Refrences
(ओजसे) 'ओजः' शब्द निघं० (२ । ९) में बल-नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४।५।६।३ ) में की गई है ॥ ७ । २८ ॥
Commentary Essence
पठन-पाठन रूप यज्ञ का उपदेश--ईश्वर उपदेश करता है कि हे योग एवं ब्रह्मविद्या को देने वाले विद्वान् ! तू इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान गुणों से युक्त आत्मा और इसके प्रकाश को योग से प्राप्त कर। योग के बिना कोई भी मनुष्य पूर्ण विद्वान नहीं हो सकता, पूर्ण विद्या के बिना कोई आत्मा और परमात्मा का बोध प्राप्त नहीं कर सकता ।
हे विद्या के दाता विद्वान् ! तू आत्मबल और योगबल और स्वयं जानकर सब को जना, उसका उपदेश कर। हे बल के दाता विद्वान् ! तू दीर्घ आयु और उसके लिये रोगापहारी औषध को स्वयं प्राप्त कर और करा। योगारूढ़ गुरु और योगजिज्ञासु शिष्य दोनों सब प्रजा के लिये सद्गुणों के प्रकाश को प्रदान करें। योग के बिना श्रेष्ठ पुरुषों के समान कोई भी प्रजा का पालन नहीं कर सकता। इसलिये सब योगविधि का अवश्य सेवन करें ।। ७ । २८ ।।