Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 26

48 Mantra
7/26
Devata- यज्ञो देवता Rishi- देवश्रवा ऋषिः Chhand- स्वराट् ब्राह्मी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यस्ते॑ द्र॒प्स स्कन्द॑ति॒ यस्ते॑ऽअ॒ꣳशुर्ग्राव॑च्युतो धि॒षण॑योरु॒पस्था॑त्। अ॒ध्व॒र्योर्वा॒ परि॑ वा॒ यः प॒वित्रा॒त्तं ते॑ जुहोमि॒ मन॑सा॒ वष॑ट्कृत॒ꣳ स्वाहा॑ दे॒वाना॑मुत्क्रम॑णमसि॥२६॥

यः। ते॒। द्र॒प्सः। स्कन्द॑ति। यः। ते॒। अ॒ꣳशुः। ग्राव॑च्युत॒ इति॒ ग्राव॑ऽच्युतः। धि॒षण॑योः। उ॒पस्था॒दित्यु॒पऽस्था॑त्। अ॒ध्व॒र्य्योः। वा॒। परि॑। वा॒। यः। प॒वित्रा॑त्। तम्। ते॒। जु॒हो॒मि॒। मन॑सा। वष॑ट्कृत॒मिति॒ वष॑ट्ऽकृतम्। स्वाहा॑। दे॒वाना॑म्। उ॒त्क्रम॑ण᳖मित्यु॒त्ऽक्रम॑णम्। अ॒सि॒ ॥२६॥

Mantra without Swara
यस्ते द्रप्स स्कन्दति यस्ते अँशुर्ग्रावच्युतो धिषणयोरुपस्थाति अध्वर्यार्वा परि वा यः पवित्रात्तन्जुहोमि मनसा वषट्कृतँ स्वाहा देवानामुत्क्रमणमसि ॥

यः। ते। द्रप्सः। स्कन्दति। यः। ते। अꣳशुः। ग्रावच्युत इति ग्रावऽच्युतः। धिषणयोः। उपस्थादित्युपऽस्थात्। अध्वर्य्योः। वा। परि। वा। यः। पवित्रात्। तम्। ते। जुहोमि। मनसा। वषट्कृतमिति वषट्ऽकृतम्। स्वाहा। देवानाम्। उत्क्रमणमित्युत्ऽक्रमणम्। असि॥२६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे यज्ञ के पति ! (यः) जो यज्ञ का साधन रूप (ते) तेरा (द्रप्सः) यज्ञ के पदार्थों का समूह (स्कन्दति) वायु के साथ सर्वत्र गति करता है एवं ग्रन्थों को प्राप्त होता है, और जो (ते) तेरा (ग्रावच्युतः) मेघ से छूटा हुआ (अंशुः) यज्ञ के पदार्थों का भाग (धिषणयोः) प्रकाश और भूमि के (पवित्रात्) निर्मल (उपस्थात्) समीपवर्ती स्थान से, और (यः) जो शुद्ध पदार्थों का समूह (वा) अध्वर्यु एवं होता आदि के पास से [परि] सब ओर से (वा) शुद्ध गुणों को प्रकाशित करता है, इसलिये उसे मैं (ते) तेरे लिये (स्वाहा ) सत्यवाणी और (मनसा) शुभ विचार से (वषट्कृतम्) सङ्कल्पपूर्वक (जुहोमि) उसे फल सहित तुझे प्रदान करता हूँ, जिससे तू यज्ञपति (देवानाम्) आप्त विद्वानों को (उत्क्रमणम्) तेज के समान ऊँचाउठाने वाला (असि) है ॥ ७ । २६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है॥होता आदि विद्वान् लोग अत्यन्त बलदायक सामग्री से यज्ञ करते हुये जिन सुगन्धित पदार्थों को अग्नि में छोड़ते हैं, वे जल और वायु को शुद्ध करके, बादल के साथ पृथिवी पर आकर सब रोगों को हटाकर सब प्राणियों को आनन्द देते हैं। इसलिये सब मनुष्य इस यज्ञ का सदा सेवा करें ॥ ७ । २६ ।।
Subject
अब ईश्वर यज्ञ के अनुष्ठान करने वाले को उपदेश करता है ।।
Refrences
(द्रप्स स्कन्दति) यहाँ'वा शर्प्रकरणे खर्परे लोप: (अ० । ८ । ३ । ३६) इस भाष्यवार्त्तिक से विसर्ग का लोप है। (अंशुः) यहाँ'अम्' धातु से 'उ' प्रत्यय और शकार का आगम है। (ग्रावच्युतः) 'ग्राव' शब्द निघं० (१ । १०) में मेघ-नामों में पढ़ा है। (धिषणयोः) 'धिषणे' शब्द निघं० (३।३०) द्यावापृथिवी नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४ । २ । ५ । २५) में की गई है।। ७ । २६ ।।
Commentary Essence
१. ईश्वर का यज्ञपतिको उपदेश--ईश्वर उपदेश करता है कि हे यजमान ! जो अत्यन्त बलदायक एवं सुगन्धकारक यज्ञकी सामग्री को तू अग्नि में छोड़ता है, वह वायु केसाथ मिलकर सर्वत्र फैल जाती है, तथा सब मनुष्यों को प्राप्त हो जाती है। बादल से जल-कण रूप में पृथक् हुआ उस यज्ञ-सामग्री का अंश, द्युलोक और भूलोक के पवित्र उपस्थ में विद्यमान उस शुद्ध यज्ञ सामग्री का अंश, होता, अध्वर्यु आदि विद्वानों के हाथ से अग्नि में छूटा हुआ यज्ञसामग्री का अंश सब ओर शुद्ध गुणों का प्रसार कर देता है। इसलिये मैं वेदोक्त सत्य वाणी से और उत्तम विचारपूर्वक संकल्प के समान तुझे उक्त यज्ञ को प्रदान करता हूँ और साथ में उस यज्ञ का फल भी बतलाता हूँ। क्योंकि हे यजमान ! तू आप्त विद्वान् पुरुषों में ऊपर को गति करने वाले तेज के समान है। इसलिये तू इस यज्ञानुष्ठान में प्राप्त विद्वानों को आगे बढ़ने की प्रेरणा कर उन्हें इस दिशा में प्रकाश प्रदान कर ॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार यह है कि होता, अध्वर्यु आदि विद्वानों के समान सब मनुष्य यज्ञ का सेवन करें ॥ ७ । २६ ॥