Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 22

48 Mantra
7/22
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- विराट ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा बृ॒हद्व॑ते॒ वय॑स्वतऽउक्था॒व्यं गृह्णामि। यत्त॑ऽइन्द्र बृ॒हद्वय॒स्तस्मै॑ त्वा॒ विष्ण॑वे त्वै॒ष ते॒ योनि॑रु॒क्थेभ्य॑स्त्वा दे॒वेभ्य॑स्त्वा देवा॒व्यं य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णामि॥२२॥

उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृहीतः। अ॒सि॒। इन्द्रा॑य। त्वा॒। बृहद्व॑त॒ इति॑ बृहत्ऽव॑ते। वय॑स्वते। उ॒क्थाव्य᳖मित्यु॑क्थऽअ॒व्य᳖म्। गृ॒ह्णा॒मि॒। यत्। ते॒। इ॒न्द्र॒। बृ॒हत्। वयः॑। तस्मै॑। त्वा॒। विष्ण॑वे। त्वा॒। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। उ॒क्थेभ्यः॑। त्वा॒। दे॒वेभ्यः॑। त्वा॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। य॒ज्ञस्य॑। आयु॑षे। गृ॒ह्णा॒मि॒ ॥२२॥

Mantra without Swara
उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वतऽउक्थाव्यङ्गृह्णामि । यत्तऽइन्द्र बृहद्वयस्तस्मै त्वा विष्णवे त्वैष ते योनिरुक्थेभ्यस्त्वा देवेभ्यस्त्वा देवाव्यँयज्ञस्यायुषे गृह्णामि मित्रावरुणाभ्यान्त्वा ॥

उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। इन्द्राय। त्वा। बृहद्वत इति बृहत्ऽवते। वयस्वते। उक्थाव्यमित्युक्थऽअव्यम्। गृह्णामि। यत्। ते। इन्द्र। बृहत्। वयः। तस्मै। त्वा। विष्णवे। त्वा। एषः। ते। योनिः। उक्थेभ्यः। त्वा। देवेभ्यः। त्वा। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। यज्ञस्य। आयुषे। गृह्णामि॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का इच्छुक मैं (राजा)--हे ( इन्द्र) सेनापते ! तूने (उपयामगृहीतः) ब्रह्मचर्य आदि श्रेष्ठ नियमपूर्वक विद्या का अध्ययन किया (असि) है, इसलिये (बृहद्वते) उत्तम कर्मों वाले (वयस्वते) बड़ी आयु वाले (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य से सम्पन्न (उक्थाव्यम्) प्रशंसा के योग्य शस्त्र-विशेषों से युक्त (त्वाम्) तुझको (गृह्णामि) सेनापति के रूप में ग्रहण करता हूँ, स्वीकार करता हूँ।
और जो (ते) तेरी (बृहद्) बड़ी (वय:) आयु है (तस्मै ) उसकी रक्षा के लिये [त्वा] तुझको, तथा (विष्णवे) परमेश्वर वा शुभ कर्म की प्राप्ति के लिये (त्वा) तुझ को, (गृह्णामि) ग्रहण करता है ।(एषः) यह सेनाधिकार (ते) तेरा (योनिः) रहने का स्थान विशेष अर्थात् घर (अस्ति) है।
(उक्थेभ्यः) प्रशंसनीय वेदोक्त कर्मों के लिये (त्वा) तुझको, (देवेभ्यः) विद्वानों वा दिव्य गुणों की रक्षा के लिये (देवाव्यम्) देवों के रक्षक (त्वा) तुझको तथा–(यज्ञस्य) राज्य के पालन आदि और (आयुषे) जीवन की वृद्धि के लिये भी (गृह्णामि) तुझको सेनापति रूप में ग्रहण करता हूँ ॥ ७ । २२ ॥
Essence
सब विद्याओं को जानने वाला विद्वान् राजा राज्य व्यवहार में सेना के वीर पुरुषों की रक्षा के लिये सुशिक्षित, शस्त्र-अस्त्र विद्या में परम चतुर, यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले वीर पुरुषको सेनापति पद पर नियुक्त करें। और--राजा तथा सेनापति परस्पर अनुमति से राज्य और यज्ञ को बढ़ावें ।। ७ । २२ ।।
Subject
अब कैसे मनुष्य को सेनापति करे, यह उपदेश किया है।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४ । २ । ३ । १०-११ ) में की गई है ।। ७ । २२ ।।
Commentary Essence
राजा कैसे पुरुष को सेनापति बनावे--धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का इच्छुक, सब विद्याओं का वेत्ता विद्वान् राजा उत्तम ब्रह्मचर्य आदि नियमपूर्वक विद्या पढ़े हुये (सुशिक्षित), यज्ञ आदि प्रशस्त कर्म करने वाले, बड़ी आयु वाले, परम ऐश्वर्य से सम्पन्न, शस्त्र-अस्त्र विद्या में अत्यन्त चतुर पुरुष को सेनापति पद पर नियुक्त करे। और वह सेनापति सेना के वीर पुरुषों के महान् जीवन की रक्षा करे। परमेश्वर की प्राप्ति और यज्ञ आदि शुभ कर्मों की रक्षा के लिये सदा प्रयत्न करे। राजा के दिये सेनाधिकार को अपना घर समझे अर्थात् सदा उसमें निवास करे, उसका परित्याग कदापि न करे। प्रशंसनीय वेदोक्त कर्म, विद्वान् पुरुष और दिव्य गुणों की सदा रक्षा करे। राज्य की रक्षा तथा प्रजा की आयु-वृद्धि के लिये सतत प्रयत्न करे। इस प्रकार सभापति राजा और सेनापति परस्पर राज्य और यज्ञ आदि शुभ कर्मों की वृद्धि करें ।।