Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 19

48 Mantra
7/19
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी पङ्क्ति Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये दे॑वासो दि॒व्येका॑दश॒ स्थ पृ॑थि॒व्यामध्येका॑दश॒ स्थ। अ॒प्सु॒क्षितो॑ महि॒नैका॑दश॒ स्थ ते दे॑वासो य॒ज्ञमि॒मं जु॑षध्वम्॥१९॥

ये। दे॑वा॒सः॒। दि॒वि। एका॑दश। स्थ। पृ॒थि॒व्याम्। अधि॑। एका॑दश। स्थ। अप्सु॒क्षित॒ इत्य॑प्सु॒ऽक्षितः॑। म॒हि॒ना। एका॑दश। स्थ। ते। दे॒वा॒सः॒। य॒ज्ञम्। इ॒मम्। जु॒ष॒ध्व॒म् ॥१९॥

Mantra without Swara
ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमथ्जुषध्वम् ॥

ये। देवासः। दिवि। एकादश। स्थ। पृथिव्याम्। अधि। एकादश। स्थ। अप्सुक्षित इत्यप्सुऽक्षितः। महिना। एकादश। स्थ। ते। देवासः। यज्ञम्। इमम्। जुषध्वम्॥१९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
(ये) जो (महिना) अपनी महिमा से (दिवि) विद्युत् में (एकादश) १. प्राण, २. अपान, ३. उदान, ४. व्यान, ५. समान, ६. नाग, ७. कूर्म, ८. कृकल, ८. देवदत्त, १०. धनञ्जय, ११. जीव (देवासः) दिव्य गुणों से युक्त (स्थ) हैं, और जो (पृथिव्याम्) पृथिवी (अधि) पर (एकादश) १. पृथिवी, २. जल, ३. अग्नि, ४. वायु, ५. आकाश, ६. सूर्य, ७. चन्द्र, ८.नक्षत्र, ९.अहंकार, १०. महत्तत्व और ११. प्रकृति (स्थ) हैं, और जो (अप्सुक्षितः) प्राणों में निवास करने वाले (एकादश) १. श्रोत्र, २. त्वचा, ३. चक्षु, ४. रसना, ५. घ्राण, ६. वाक्, ७. पाणि, ८.पाद, ९.पायु, १०. उपस्थ और ११. मन (स्थ) हैं, वे जैसे अपने-अपने कर्मों में वर्त्तमान हैं, वैसे हे (देवासः) राजसभा के रक्षक सभ्य पुरुषो एवं राजसभा के सदस्य विद्वानो ! तुमलोग (इमम्) इस (यज्ञम्) राजा और प्रजा से सम्बन्धित व्यवहार को (जुषध्वम्) सेवन करो ॥ ७ ।१९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥जैसे ये अन्तरिक्ष आदि में पदार्थअपने-अपने कर्म में रत हैं वैसे सभाजन भी अपने-अपने न्यायकर्म में प्रयत्नशील रहें ।। ७ । १९ ।।
Subject
अब राजा और सभासदों के कर्त्तव्य का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(स्थ) सन्ति । यहाँ पुरुष-व्यत्यय है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४ । २ । २ । ९) में की गई है ।। ७ । १९ ।।
Commentary Essence
१. राजा और सभाजनों का कर्त्तव्य--जैसे अपनी महत्ता से अन्तरिक्ष में प्राण आदि ग्यारह देव, पृथिवी पर पृथिवी जल आदि ग्यारहपदार्थ और प्राणों में निवास करने वाली श्रोत्र आदि ग्यारह इन्द्रियाँ अपने-अपने कर्मों में वर्त्तमान रहती हैं, वैसे राजा और सभाजन अपने राजा और प्रजासम्बन्धी न्यायकार्यों में सदा प्रयत्नशील रहें ।
२. अलङ्कार– मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त होने से वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है--अन्तरिक्ष आदि में विद्यमान अपने-अपने कार्यों में वर्तमान प्राण आदि पदार्थों के समान राजा और सभाजन अपने-अपने न्याय आदि कार्यों में सदा प्रयत्नशील रहें ॥ ७ । १९।।