Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 16

48 Mantra
7/16
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्,साम्नी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒यं वे॒नश्चो॑दय॒त् पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑। इ॒मम॒पा स॑ङ्ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं॒ न विप्रा॑ म॒तिभी॑ रिहन्ति। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ मर्का॑य त्वा॥१६॥

अ॒यम्। वे॒नः। चो॒द॒य॒त्। पृश्नि॑गर्भा॒ इति॒ पृश्नि॑ऽगर्भाः। ज्योति॑र्जरायु॒रिति॒ ज्योतिः॑ऽजरायुः। रज॑सः। वि॒मान॒ इति॑ वि॒ऽमाने॑। इ॒मम। अ॒पाम्। स॒ङ्ग॒म इति॑ सम्ऽग॒मे। सूर्य्य॑स्य। शिशु॑म्। न। विप्राः॑। म॒तिभि॒रिति॑ म॒तिऽभिः॑। रि॒ह॒न्ति॒। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। मर्का॑य। त्वा॒ ॥१६॥

Mantra without Swara
अयँवेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपाँ सङ्गमे सूर्यस्य शिशुन्न विप्रा मतिभी रिहन्ति । उपयामगृहीतोसि मर्काय त्वा ॥

अयम्। वेनः। चोदयत्। पृश्निगर्भा इति पृश्निऽगर्भाः। ज्योतिर्जरायुरिति ज्योतिःऽजरायुः। रजसः। विमान इति विऽमाने। इमम। अपाम्। सङ्गम इति सम्ऽगमे। सूर्य्यस्य। शिशुम्। न। विप्राः। मतिभिरिति मतिऽभिः। रिहन्ति। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। मर्काय। त्वा॥१६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे शिल्प विद्या की विधि जानने वाले सभाध्यक्ष विद्वान् ! आप (उपयामगृहीतः) राज्य के अङ्गों से युक्त (असि) हो, इसलिये मैं (रजसः) लोकों के मध्य में (पृश्निगर्भाः) सब लोक जिसके गर्भ में हैं उस अन्तरिक्ष लोक के समान, (ज्योतिर्जरायुः) ज्योतिर्मय तारागणों को जरायु के समान ढांपने वाले के तुल्य (अयम्) जो यह (वेनः) मनोहर चन्द्रमा (चोदयत्) गति करता है, (इमम्) इस (चन्द्रम्) चन्द्रमा के समान तथा (अपाम्) जल और (सूर्यस्य) सूर्य के (संगमे) युद्ध के समान और जैसे (शिशुम्) शिक्षा करने योग्य बालक को (विप्राः) विद्वान् लोग (मतिभिः) विद्या दान से (रिहन्ति) सत्कृत करते हैं उस शिशु के समान, और (मर्काय) दुष्टों को शान्त करने के लिये तथा श्रेष्ठों के व्यवहार को स्थापित करने के लिये तथा दुष्टों की मृत्यु के हेतु वायुविद्या को जानने के लिये (विमाने) परिमाण रहित अन्तरिक्ष में (त्वाम्) तुझे स्वीकार करता हूँ ।। ७ । १६ ।।
Essence
सभाध्यक्ष विद्वान् सूर्य और चन्द्रमा के गुणों के समान श्रेष्ठ गुणों को प्रकाशित करके दुष्टों के शमन से श्रेष्ठ व्यवहार के द्वारा सज्जनों को आनन्दित करे ।। ७ । १६ ।।
Subject
अब सभाध्यक्ष राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है ॥
Refrences
(चोदयत्) यहाँ लट् अर्थ में लङ् लकार और अट् का अभाव है। (सङ्गमे) 'सङ्गमे' शब्द निघं० (२ । १७) में सङ्ग्राम-नामों में पढ़ा है। (रिहन्ति) यह पद निघं० (३।१४) में पूजा-अर्थ वाली क्रियाओं में पढ़ा है।
इस मन्त्र की व्याख्या निरुक्त में (१० । ३८) की है और शतपथ में ( ४ । २ । १ । १०-११) व्याख्या की है।
Commentary Essence
सभाध्यक्ष राजा का कर्त्तव्य--सभाध्यक्ष विद्वान् राजा शिल्प विद्या की विधि का ज्ञाता हो, राज्य के अङ्गों से युक्त हो, जैसे सब लोक अन्तरिक्ष के गर्भ में हैं, इस प्रकार सब सभाध्यक्ष के अधीन रहें, जैसे चन्द्रमा अपने तेज से ज्योतिर्मय तारागणों को आच्छादित कर लेता है, वैसे सभाध्यक्ष भी अपने तेज से सब को जरायु के समान आच्छादित करने वाला हो, जैसे चन्द्रमा कमनीय है, सबको प्यारा लगता है, वैसे सभाध्यक्ष भी सब को प्रिय लगने वाला एवं सब से प्रेम करने वाला हो, जैसे चन्द्रमा गतिशील है वैसे स्वयं पुरुषार्थी एवं राज्य का संचालन करने वाला हो। जैसे जल अर्थात् मेघ और सूर्य के युद्ध में सूर्य का विजय और मेघ का पराजय होता है, वैसे युद्ध में विजय प्राप्त करने वाला हो । जैसे मेधावी विद्वान् लोग विद्यादान से बालक का सत्कार करते हैं, वैसे सभाध्यक्ष राजा अपनी प्रजा रूप सन्तान का सत्कार करे। प्रजा भी सभासद राजा का पूर्ण सम्मान करे। जैसे उक्त सूर्य और चन्द्रमा पदार्थों को प्रकाशित करते हैं, वैसे सभाध्यक्ष श्रेष्ठ गुणों को प्रकाशित करके दुष्टों का शमन और श्रेष्ठ व्यवहारों की स्थापना कर सज्जनों को आनन्दित करे। सभाध्यक्ष दुष्टों को मृत्यु के लिये वायुविद्या का ज्ञाताहो । प्रजाजन परिमाणरहित अर्थात् अत्यन्त विशाल प्राङ्गण वाली सभा में सभाध्यक्ष राजा का वरण करे, राजा स्वीकार करे ।। ७ । १६ ।।