Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 10

48 Mantra
7/10
Devata- मित्रावरुणौ देवते Rishi- त्रिसदस्युर्ऋषिः Chhand- ब्राह्मी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
रा॒या व॒यꣳ स॑स॒वासो॑ मदेम ह॒व्येन॑ दे॒वा यव॑सेन॒ गावः॑। तां धे॒नुं मि॑त्रावरुणा यु॒वं नो॑ वि॒श्वाहा॑ धत्त॒मन॑पस्फुरन्तीमे॒ष ते॒ योनि॑र्ऋता॒युभ्यां॑ त्वा॥१०॥

रा॒या। व॒यम्। स॒स॒वास॒ इति॑ सस॒ऽवासः॑। म॒दे॒म॒। ह॒व्ये॑न। दे॒वाः। यव॑सेन। गावः॑। ताम्। धे॒नुम्। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। यु॒वम्। नः॒। वि॒श्वाहा॑। ध॒त्त॒म्। अन॑पस्फुरन्ती॒मित्यन॑पऽस्फुरन्तीम्। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। ऋ॒ता॒युभ्या॑म्। ऋ॒त॒युभ्या॑मित्यृ॑तयुऽभ्या॑म्। त्वा॒ ॥१०॥

Mantra without Swara
राया वयँ ससवाँसो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः । तान्धेनुम्मित्रावरुणा युवन्नो विश्वाहा धत्तमनपस्फुरन्तीमेष ते योनिरृतायुभ्यान्त्वा ॥

राया। वयम्। ससवास इति ससऽवासः। मदेम। हव्येन। देवाः। यवसेन। गावः। ताम्। धेनुम्। मित्रावरुणा। युवम्। नः। विश्वाहा। धत्तम्। अनपस्फुरन्तीमित्यनपऽस्फुरन्तीम्। एषः। ते। योनिः। ऋतायुभ्याम्। ऋतयुभ्यामित्यृतयुऽभ्याम्। त्वा॥१०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (ससवांसः) बुरे-भले कर्मों का विवेक करने वाले (देवाः) विद्वानो ! (वयम्) हम पुरुषार्थी लोग, (यवसेन) अभीष्ट तृण, भूसा आदि से (गाव:) गौ आदि पशुओं के समान (हव्येन) ग्रहण करने योग्य (राया) धन से (मदेम) प्रसन्न रहें ।
हे (मित्रावरुणा) प्राण के समान सखा, उत्तम अध्यापक और शिष्य जनो ! (युवम्) तुम दोनों (नः) हमारे लिये (विश्वाहा) सब दिन (अनपस्फुरन्तीम् ) सब विद्याओं का उपदेश करने वाली, योगविद्या से उत्पन्न वेदवाणी जो (धेनुम्) आनन्दरस का पान कराने वाली कामधेनु है, उसे (धत्तम्) धारण करो।
हे यजमान ! यह तेरा विद्याबोध (योनिः) घर के समान दुःख का निवारण करने वाला है, इसलिये (ऋतायुभ्याम्) उक्त अध्यापक और शिष्य दोनों विद्या के इच्छुक जनों सहित (त्वा) आपको (वयम्) हम पुरुषार्थी लोग स्वीकार करते हैं ।। ७ । १० ।।
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है।।सब मनुष्य पुरुषार्थ और विद्वानों के संग से परोपकार को सिद्ध करने वाली कामधेनु रूप वेदवाणी को प्राप्त करके आनन्द में रहें ।। ७ । १० ।।
Subject
फिर भी योग पढ़ने-पढ़ाने वालों के कृत्य का उपदेश किया है ॥
Refrences
(धेनुम्)'धेनु' शब्द निघं ० ( १ । ११) में वाणी-नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (४ । १ । ४ । १०) में की गई है ।। ७ । १० ।।
Commentary Essence
योगविद्या के अध्यापक और शिष्य के कर्म--विद्वान लोग सत्य और असत्य को संविभक्त करने वाले होते हैं और पुरुषार्थी लोग, जैसे गौ आदि पशु उत्तम तृण घास, और भूसा आदि से प्रसन्न होते हैं, वैसे ग्रहण करने योग्य धन से बड़े प्रसन्न होते हैं।
योगविद्या के अध्यापक और शिष्य प्राण और उदान के समान पर परस्पर सखा होते हैं। वे दोनों सदा परोपकार को सिद्ध करने वाली, सब विद्याओं का उपदेश करने वाली, योगविद्या से प्राप्त करने योग्य, आनन्द रस का पान कराने वाली, कामधेनुरूप वेदवाणी को धारण करते हैं।
जैसे घर सब दुःखों का निवारण करके सब सुख प्रदान करता है, उसी प्रकार विद्याबोध भीदुःखों का निवारक और सुखों का उत्पादक है। इसलिये सब मनुष्य पुरुषार्थ से और आत्मा से विद्या (विज्ञान) की कामना करने वाले विद्वानों के सङ्ग से उक्त वेदवाणी को प्राप्त करके सदा आनन्द में रहें।। ७ । १० ।।