Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 9

37 Mantra
6/9
Devata- सविता आश्विनौ पूषा च देवताः Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- प्राजापत्या बृहती,निचृत् अति जगती Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। अ॒ग्नीषोमा॑भ्यां॒ जुष्टं॒ नियु॑नज्मि। अ॒द्भयस्त्वौष॑धी॒भ्योऽनु॑ त्वा मा॒ता म॑न्यता॒मनु॑ पि॒तानु॒ भ्राता॒ सग॒र्भ्योऽनु॒ सखा॒ सयू॑थ्यः। अ॒ग्नीषोमा॑भ्यां त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि॥९॥

दे॒वस्य॑ त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्याम्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम्। अ॒ग्नीषोमा॑भ्याम्। जुष्ट॑म्। नि। यु॒न॒ज्मि॒। अ॒द्भ्य इत्य॒द्ऽभ्यः। त्वा॒। ओष॑धीभ्यः। अनु॑। त्वा॒। मा॒ता। म॒न्य॒ता॒म्। अनु॑। पि॒ता। अनु॑। भ्राता॑। सगर्भ्य॒ इति॑ सऽगर्भ्यः। अनु॑। सखा॑। सयू॑थ्य इति॑ सऽयू॑थ्यः। अ॒ग्नीषोमा॑भ्याम्। त्वा॒। जुष्ट॑म्। प्र। उ॒क्षा॒मि॒ ॥९॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । अग्नीषोमाभ्याञ्जुष्टन्नि युनज्मि । अद्भ्यस्त्वौषधीभ्योऽनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्यानु सखा सयूथ्यः । अग्नीषोमाभ्यान्त्वा जुष्टंम्प्रोक्षामि ॥

देवस्य त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्। अग्नीषोमाभ्याम्। जुष्टम्। नि। युनज्मि। अद्भय इत्यद्ऽभ्यः। त्वा। ओषधीभ्यः। अनु। त्वा। माता। मन्यताम्। अनु। पिता। अनु। भ्राता। सगर्भ्य इति सऽगर्भ्यः। अनु। सखा। सयूथ्य इति सऽयूथ्यः। अग्नीषोमाभ्याम्। त्वा। जुष्टम्। प्र। उक्षामि॥९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे शिष्य ! मैं ( सवितुः) सकल ऐश्वर्य वाले (देवस्य) वेदविद्या के प्रकाशक ईश्वर के (प्रसवे) इन उत्पन्न संसार में (अश्विनोः) सूर्य और चन्द्रमा के (बाहुभ्याम्) गुणों को तथा (पूषण:) पृथिवी के (हस्ताभ्याम्) हाथ के समान धारण और आकर्षण रूप गुणों को तुझ में स्थापित करने के लिये [त्वा] तुझे विद्यार्थी स्वीकार करता हूँ।
और--(अग्निषोमाभ्याम्) अग्नि के तेज और सोम के शान्ति गुण के लिये (त्वा) तुझ विद्यार्थी को, जो ब्रह्मचर्य-धर्म के अनुकूल जल और औषधियाँ हैं उन (अद्भ्यः) जल और (ओषधीभ्यः) रोगनिवारक औषधियों को ग्रहण करने के लिये (नियुनज्मि) नियुक्त करता हूँ।
और [त्वा] तुझे मेरे पास रहने के लिये तेरी (माता) जननी ( अनु+मन्यताम् ) अनुमति दे, तेरा (पिता) जनक (अनु+मन्यताम् ) अनुमति दे, (सगर्भ्यः) सगा (भ्राता) भाई (अनु+मन्यताम् ) अनुमति दे, (सखा) मित्र (अनु+मन्यताम्) अनुमति दे, (सयूथ्यः) साथी (अनु+मन्यताम्) अनुमति दे और--(अग्नीषोमाभ्याम्) पूर्वोक्त अग्नि और सोम के तेज और शान्ति गुणों को ग्रहण कराने के लिये (जुष्टम्) प्रेमपूर्वक [त्वा] तुझे (प्रोक्षामि) उन गुणों से मैं अभिषिक्त करता हूँ ॥ ६।९ ॥
Essence
इस संसार में माता, पिताआदि तथा बन्धु और मित्र वर्ग अपने सन्तानों को उत्तम शिक्षा देकर उनसे ब्रह्मचर्य का पालन करावें, जिससे वे श्रेष्ठ गुणों वाले बन सकें ॥ ६।९॥
Subject
फिर वह गुरु शिष्य को क्या उपदेश करे, यह इस मन्त्र में कहा है॥
Refrences
(पूष्ण:) पूषा' शब्द निघं ० ( १। १) में पृथिवी नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३। ७।४। ३-५) में की गई है ॥ ६।९॥
Commentary Essence
गुरु शिष्य को क्या उपदेश करे--हे शिष्य! ईश्वर सकल ऐश्वर्य से सम्पन्न तथा वेदविद्या का प्रकाशक है, उसके उत्पन्न किये इस संसार में सूर्य और चन्द्रमा के तेज और शान्ति गुणों को तथा पृथिवी के धारण और आर्कषण गुणों को तुझ में आधान करने के लिये तुझे विद्या-अर्थी रूप में ग्रहण करता हूँ। तेज और शान्ति गुणों को प्रेम-पूर्वक ग्रहण करने के लिये तथा तेरे ब्रह्मचर्य-धर्म के अनुकूल, जल-औषधि आदि पदार्थों को भी ग्रहण करने के लिये तुझे आज्ञा देता हूँ। मेरे पास में उत्तम शिक्षा ग्रहणपूर्वक ब्रह्मचर्य-पालन करने के लिये तेरे माता-पिता, सगे भाई, मित्र और साथियों की अनुमति चाहता हूँ। और कामना करता हूँ कि तेरे माता-पिता तथा बन्धु और मित्र वर्ग भी तुझे उत्तम शिक्षा से ब्रह्मचर्य-पालन का उपदेश करें। मैं तेज और शान्ति आदि गुणों से तुझे सींचता हूँ।। ६। ९॥