Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 32

37 Mantra
6/32
Devata- सभापती राजा देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- पंचपदा ज्योतिष्मती जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑य त्वा॒ वसु॑मते रु॒द्रव॑त॒ऽइन्द्रा॑य त्वादि॒त्यव॑त॒ऽइन्द्रा॑य त्वाभिमाति॒घ्ने। श्ये॒नाय॑ त्वा सोम॒भृते॒ऽग्नये॑ त्वा रायस्पोष॒दे॥३२॥

इन्द्रा॑य। त्वा॒। वसु॑मत॒ इति॒ वसु॑ऽमते। रु॒द्रव॑त॒ इति॑ रु॒द्रऽव॑ते। इन्द्रा॑य। त्वा॒। आ॒दि॒त्यव॑त॒ इत्या॑दित्यऽव॑ते। इन्द्रा॑य। त्वा॒। अ॒भि॒मा॒ति॒घ्न इत्य॑भिमाति॒ऽघ्ने। श्ये॒नाय॑। त्वा॒। सो॒म॒भृत॒ इति॑ सोम॒ऽभृते॑। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। रा॒य॒स्पो॒ष॒द इति॑ रायस्पोष॒दे ॥३२॥

Mantra without Swara
इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते इन्द्राय त्वादित्यवते इन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने । श्येनाय त्वा मोमभृतेग्नये त्वा रायस्पोषदे ॥

इन्द्राय। त्वा। वसुमत इति वसुऽमते। रुद्रवत इति रुद्रऽवते। इन्द्राय। त्वा। आदित्यवत इत्यादित्यऽवते। इन्द्राय। त्वा। अभिमातिघ्न इत्यभिमातिऽघ्ने। श्येनाय। त्वा। सोमभृत इति सोमऽभृते। अग्नये। त्वा। रायस्पोषद इति रायस्पोषदे॥३२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे सभापते राजन् ! (वसुमते) चौबीस (२४) वर्ष ब्रह्मचर्य सेवन करने वाले अनेक विद्वान् जिससे उत्पन्न होते हैं उस कर्म के लिये, (रुद्रवते) चवालीस (४४) वर्ष ब्रह्मचर्य सेवन करने वाले उत्तम, वीर, शत्रुओं को रुलाने वाले विद्वान् जिससे होते हैं उस कर्म के लिये, (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये (त्वा) तुझे, (आदित्यवते) अड़तालीस (४८) वर्ष ब्रह्मचर्य सेवन करने वाले विद्वान् जिससे होते हैं उस कर्म के लिये (इन्द्राय) श्रेष्ठ विद्या के प्रकाश से अविद्या का विदारण करने के लिये (त्वा) तुझे, (अभिमातिघ्ने) अभिमानी शत्रुओं के हनन के लिये (इन्द्राय) श्रेष्ठों की रक्षा के लिये (त्वा) तुझे, (सोमभृते) ऐश्वर्यों को धारण करने वाले के लिये (श्येनाय) बाज-पक्षी के समान चेष्टा करने वाले के लिये (त्वा) तुझे (रायस्पोषदे) धन को पुष्ट करने वाले (अग्नये) विद्युत् आदि की प्राप्ति के लिये (त्वा) तुझे हम (वृणुमः) निर्वाचित करते हैं।। ६। ३२ ॥
Essence
जो इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, चन्द्रऔर धनवान् के गुणों से युक्त, विद्वानोंका प्रिय, विद्या का प्रचारक और सबको सुख देवेउसे ही सब राजा मानें।। ६। ३२।।
Subject
जो राज्य व्यवहार सभा के ही आधीन हो तो किसलियेप्रजाजनों को सभापति को स्वीकार करना चाहिये, यह उपदेश किया है।।
Refrences
(रायस्पोषदे) यहाँ 'सुपां सुलुक्०’ [अ० ७।१।३९] इस सूत्र से 'ङे' के स्थान में 'शे' आदेश है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।९।४। ९-१०) में की गई है।। ६। ३२।।
Commentary Essence
सभापति राजा का प्रयोजन-- राजा का व्यवहार जब सभा के ही अधीन है तब प्रजा-जन राजा को किस प्रयोजन के लिये स्वीकार करें? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि हे सभापते राजन्! हम लोग तुझे इस लिये वरण करते हैं कि जिससे आप २४ वर्ष ब्रह्मचर्य-पालन करने वाले विद्वान् वसु ब्रह्मचारी, ४४ वर्ष ब्रह्मचर्य-पालन करने वाले विद्वान्, शत्रुओं को रुलाने वाले वीर रुद्र ब्रह्मचारी, परम ऐश्वर्य से सम्पन्न इन्द्र, ४८ वर्ष ब्रह्मचर्य-पालन करने वाले आदित्य ब्रह्मचारी, परम-विद्या के प्रकाश से अविद्या का विनाश करने वाले, अभिमानी शत्रुओं का विनाशक, विनीत विद्वानों के रक्षक, ऐश्वर्यों को धारण करने वाले, बाज पक्षी के समान चेष्टा करने वाले, धन को बढ़ाने वाले, तथा विद्युत् आदि के गुणों से युक्त हो। इन गुणों के कारण तथा सबको सुख देने वाले होने से हम तुझे राजा मानते हैं।। ६। ३२।।