Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 28

37 Mantra
6/28
Devata- प्रजा देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
कार्षि॑रसि समु॒द्रस्य॒ त्वा क्षि॑त्या॒ऽउन्न॑यामि। समापो॑ऽअ॒द्भिर॑ग्मत॒ समोष॑धीभि॒रोष॑धीः॥२८॥

कार्षिः॑। अ॒सि॒। स॒मु॒द्रस्य॑। त्वा। अक्षि॑त्यै। उत्। न॒या॒मि॒। सम्। आपः॑। अ॒द्भिरित्य॒त्ऽभिः। अ॒ग्म॒त॒। सम्। ओष॑धीभिः। ओष॑धीः ॥२८॥

Mantra without Swara
कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्या उन्नयामि । समापो अद्भिरग्मत समोषधीभिरोषधीः ॥

कार्षिः। असि। समुद्रस्य। त्वा। अक्षित्यै। उत्। नयामि। सम्। आपः। अद्भिरित्यत्ऽभिः। अग्मत। सम्। ओषधीभिः। ओषधीः॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे वैश्य जन! तू (कार्षिः) हल से भूमि को जोतने वाला (असि) है। [त्वा] तुझे (समुद्रस्य) आकाश को (अक्षित्यै) जल-परमाणुओं से पूर्ण करने के लिये (समुन्नयामि) उत्साहित करता हूँ। तुम सब यज्ञ से शुद्ध किये (अद्भिः) जलों से (आपः) जलों को तथा (ओषधीभिः) सोम आदि औषधियों के होम से (ओषधीः) सोम आदि औषधियों को (समग्मतः) प्राप्त करो ॥ ६ । २८ ॥
Essence
खेतों आदि में नाना प्रकार की औषधियाँ उत्पन्न होती हैं, औषधियों से अग्निहोत्र आदि यज्ञ किये जाते हैं, यज्ञों से आकाश जल के परमाणुओं से परिपूर्ण हो जाता है। इसलिये—
विद्वान् लोग निर्बुद्धि लोगों को खेतों आदि में ले जाते हैं। क्योंकि वे विद्याभ्यास करने में समर्थ ही नहीं होते ॥ ६ । २८ ॥
Subject
अब अध्यापक जन प्रत्येक जन को क्या-क्या उपदेश करे, यह वर्णन किया है॥
Refrences
(कार्षि:) यहाँ 'इञ् वपादिभ्यः (अ०३।३।१०८) इस भाष्य वार्त्तिक से 'इञ्' प्रत्यय है। (समुद्रस्य) अन्तरिक्षस्य।'समुद्र' शब्द निघं० ( १। ३) में अन्तरिक्ष-नामों में पढ़ा है। (अग्मत) प्राप्नुत। यहाँ लोट्-अर्थ में लुङ् लकार है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।९।३।२६-३१ ) में की गई है।। ६। २८॥
Commentary Essence
विद्वान् अध्यापक प्रत्येक जन को क्या-क्या उपदेश करे-- विद्वान् अध्यापक उपदेश करता है कि हे वैश्य ! तू हल से भूमि को जोतने वाला है। मैं तुझे आकाश को जल के परमाणुओं से परिपूर्ण करने के लिये शिक्षा करता हूँ। क्योंकि जल के बिना हल सफल नहीं हो सकता। अतः प्रत्येक मनुष्य जलों को शुद्ध करने के लिए यज्ञ करे तथा यज्ञ से शुद्ध किये हुये जलों का ही उपयोग करे। सोम आदि औषधियों का यज्ञ में होम करे क्योंकि सोम आदि औषधियों के होम से वर्षा और शुद्ध वर्षा से सोम आदि दिव्य औषधियाँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार औषधियों से औषधियों को प्राप्त करें। ये औषधियाँ खेतों आदि में उत्पन्न होती हैं। इनसे अग्निहोत्र आदि यज्ञ किये जाते हैं। यज्ञ से आकाश जल के परमाणुओं से भर जाता है, जिससे वर्षा होती है। वर्षा से ही सब औषधियाँ पैदा होती हैं। खेतों आदि में औषधियों को उत्पन्न करने के लिये विद्वान् लोग निर्बुद्धि लोगों को ले जाते हैं क्योंकि वे निर्बुद्धि होने से विद्याभ्यास नहीं कर सकते ॥ ६ ।२८ ॥