Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 27

37 Mantra
6/27
Devata- आपो देवताः Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
देवी॑रापोऽअपां नपा॒द्यो व॑ऽऊ॒र्मिर्ह॑वि॒ष्यऽइन्द्रि॒यावा॑न् म॒दिन्त॑मः। तं दे॒वेभ्यो॑ देव॒त्रा द॑त्त शुक्र॒पेभ्यो॒ येषां॑ भा॒ग स्थ॒ स्वाहा॑॥२७॥

देवीः॑। आ॒पः। अ॒पा॒म्। नपा॒त्। यः। वः॒। ऊ॒र्म्मिः। ह॒वि॒ष्यः॒। इ॒न्द्रि॒यावा॑न्। इ॒न्द्रि॒यवा॒निती॑न्द्रिय॒ऽवा॑न्। म॒दिन्त॑म॒ इति॑ म॒दिन्ऽत॑मः। तम्। दे॒वेभ्यः॑। दे॒व॒त्रेति॑ देव॒ऽत्रा। द॒त्त॒। शु॒क्र॒पेभ्य इति॑ शुक्र॒ऽपेभ्यः॑। येषा॑म्। भा॒गः। स्थ। स्वाहा॑ ॥२७॥

Mantra without Swara
देवीरापो अपान्नपाद्यो व ऊर्मिर्विष्य इन्द्रियावान्मदिन्तमः । तन्देवेभ्यो देवत्रा दत्त शुक्रपेभ्यो येषाम्भाग स्थ स्वाहा ॥

देवीः। आपः। अपाम्। नपात्। यः। वः। ऊर्म्मिः। हविष्यः। इन्द्रियावान्। इन्द्रियवानितीन्द्रियऽवान्। मदिन्तम इति मदिन्ऽतमः। तम्। देवेभ्यः। देवत्रेति देवऽत्रा। दत्त। शुक्रपेभ्य इति शुक्रऽपेभ्यः। येषाम्। भागः। स्थ। स्वाहा॥२७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
(आपः) आप्त (देवीः) दिव्यगुण युक्त प्रजाजनो! तुम राजभक्त (स्थ) बनो। और (शुक्रपेभ्यः) वीर्य की रक्षा करने वाले (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये जो (वः) तुम्हारा (अपां नपात्) अविनाशी, (ऊर्मिः) जलतरङ्ग के समान (इन्द्रियवान्) इन्द्रियों को बलवान् बनाने वाला (मदिन्तमः) अत्यन्त आनन्द देने वाला (हविष्यः) हवि के लिये हितकारी, (भागः) भाग है उसे (स्वाहा) श्रेष्ठ वाणी से ग्रहण करो। और जैसे राजा आदि सभ्य लोग (देवत्रा) दिव्य गुण युक्त भोगों को तुम्हें प्रदान करते हैं वैसे इन्हें तुम भी (दत्त) प्रदान करो ॥ ६ । २७ ॥
Essence
प्रजा-जनों को यह उचित है कि उत्कृष्ट गुण वाले सभापति को स्वीकार करकेराज्य की रक्षा के लिये कर-प्रदान करके न्याय को प्राप्त करें।। ६। २७।।
Subject
फिर राजा और प्रजा कैसे वर्ताव करें, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
(मदिन्तमः) यह 'नाद्धस्य' (अ० ८।२।१७ ) इस सूत्र से 'मदिन्' शब्दसे परे 'नुट्' का आगम है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।९।३।२५) में की गई है।। ६। २७।।
Commentary Essence
राजा और प्रजा का वर्त्ताव-श्रेष्ठ एवं दिव्य गुणों से युक्त प्रजा-जन राजभक्त हों। वीर्य की रक्षा करने वाले विद्वानों की सेवा के लिये, जल में सदा वर्तमान जलतरङ्ग के समान, इन्द्रियों को प्रशस्त (सबल) करने वाले अत्यन्त आनन्ददायक, यज्ञ की हवि के लिये भी हितकारी अपने भोग्य पदार्थों को प्रजा-जन राजा से सत्कारपूर्ण वाणी से ग्रहण करें। जैसे राजा आदि सभ्य लोग दिव्य गुणों से युक्त भोग पदार्थों को प्रदान करते हैं, वैसे प्रजाजन भी उत्कृष्ट गुण वाले राजा को राज्य की रक्षा के लिये कर-प्रदान करें तथा न्याय को प्राप्त करें ॥ ६। २७।।