Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 22

37 Mantra
6/22
Devata- वरुणो देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- ब्राह्मी स्वराट् उष्णिक्,निचृत् अनुष्टुप्, Swara- ऋषभः, षड्जः
Mantra with Swara
मापो मौष॑धीर्हिꣳसी॒र्धाम्नो॑ धाम्नो राजँ॒स्ततो॑ वरुण नो मुञ्च। यदा॒हुर॒घ्न्याऽइति॒ वरु॒णेति॒ शपा॑महे॒ ततो॑ वरुण नो मुञ्च। सु॒मि॒त्रि॒या न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु दुर्मित्रि॒यास्तस्मै॑ सन्तु॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः॥२२॥

मा। अ॒पः। मा। ओष॑धीः। हि॒ꣳसीः॒। धाम्नो॑धाम्न॒ इति॑ धाम्नः॑ऽधाम्नः। रा॒ज॒न्। ततः॑। व॒रु॒ण। नः॒। मु॒ञ्च॒। यत्। आ॒हुः॒। अ॒घ्न्याः। इति॑। वरु॑ण। इति॑। शपा॑महे। ततः॑। व॒रु॒ण॒। नः॒। मु॒ञ्च॒। सु॒मि॒त्रि॒या इति॑ सु॑ऽमि॒त्रि॒याः। नः॒। आपः॑। ओष॑धयः। स॒न्तु॒। दु॒र्मि॒त्रि॒या इति॑ दुःऽमित्रि॒याः। तस्मै॑। स॒न्तु॒। यः। अस्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः ॥२२॥

Mantra without Swara
मापो मौषधीर्हिँसीः धाम्नोधाम्नो राजँस्ततो वरुण नो मुञ्च । यदाहुरघ्न्याऽइति वरुणेति शपामहे ततो वरुण नो मुञ्च । सुमित्रिया नऽआप ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियासस्तस्मै सन्तु योस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयन्द्विष्मः ॥

मा। अपः। मा। ओषधीः। हिꣳसीः। धाम्नोधाम्न इति धाम्नःऽधाम्नः। राजन्। ततः। वरुण। नः। मुञ्च। यत्। आहुः। अघ्न्याः। इति। वरुण। इति। शपामहे। ततः। वरुण। नः। मुञ्च। सुमित्रिया इति सुऽमित्रियाः। नः। आपः। ओषधयः। सन्तु। दुर्मित्रिया इति दुःऽमित्रियाः। तस्मै। सन्तु। यः। अस्मान्। द्वेष्टि। यम्। च। वयम्। द्विष्मः॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (राजन्) सभापते! आप (अपः) जलों को (औषधीः) जौ आदि औषधियों को (मा) मत (हिंसी:) नष्ट करो केवल यही नहीं किन्तु आप (ततः) उस-उस (धाम्नो धाम्नः) स्थान से [नः] हमें (मा) मत (मुञ्च) छुड़ा।
हे (वरुण) प्रशस्त सेनापते! (अघ्न्याः) हनन करने के अयोग्य गौवें हैं (इति) ऐसा (यत्) जो आप (आहुः) कहते हैं और हम भी इसी प्रकार (शपामहे) कहते हैं (ततः) इसीलिये आप [नः] हमें (मा मुञ्च) न छोड़ें और हम भी आपको न छोड़ें।
हे (वरुण) न्यायकारिन् [इति] इस प्रकार (नः) हमारे लिए (आपः) जल और (औषधयः) औषधियाँ (सुमित्रियाः) श्रेष्ठ मित्र के समान(सन्तु) हों। (यः) जो शत्रु (अस्मान्) हम लोगों से (द्वेष्टि) द्वेष करता है और (यं च) जिस शत्रु से (वयम्) हम (द्विष्माः) द्वेष करते हैं (तस्मै) उस शत्रु के लिये (दुर्मित्रियाः) दुष्ट मित्र के समान ( सन्तु) हों ॥ ६ ॥ २२ ॥
Essence
राजपुरुष प्रजा से अन्याय से धन ग्रहण न करें। राजा भी (की) रक्षा की प्रतिज्ञा करें कि हम अन्याय नहीं करेंगे तथा दुष्टों को सदा दण्ड दें।। ६। २२।।
Subject
अब व्यापार करने के लिये राज-व्यवस्था का उपदेश किया है।।
Refrences
(अघ्न्याः) यह शब्द निघं० (२। ११) में गो-नामों में पड़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३। ८। ५। ९-११) में की गई है।। ६। २२।।
Commentary Essence
वाणिज्य के लिये राज-व्यवस्था--व्यापार को समुन्नत करने का अभिलाषी राजा जल तथा जौ आदि औषधियों का विनाश न करे केवल इतना ही नहीं अपितु वाणिज्य के स्थानों से व्यापारियों को पृथक् न करे। राजा और व्यापारी जन गौ आदि पशुओं की हत्या न करें किन्तु इन्हें अहिंसनीय समझें। गौ आदि पशुओं से राजा और व्यापारी दूर न रहें अपितु उनका पालन-पोषण करें। राजपुरुष न्यायकारी हों। अन्याय से प्रजा से धन ग्रहण न करें। राजा ऐसी व्यवस्था करे कि प्रजा के लिये जल और औषधियाँ श्रेष्ठ मित्र के समान उपकारक हों और श्रेष्ठ जनों से द्वेष करने वाले शत्रुओं के लिये जल और औषधियाँ शत्रु के समान अपकारक हों। राजपुरुष राजा की रक्षा के लिये प्रतिज्ञा-बद्ध हों कि हम अन्याय कभी नहीं करेंगे और दुष्टों को सदा दण्ड देंगे और श्रेष्ठों की रक्षा करेंगे।। ६। २२।