Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 21

37 Mantra
6/21
Devata- सेनापतिर्देवता Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- याजुषी उष्णिक्,स्वराट् उत्कृति, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स॒मु॒द्रं ग॑च्छ॒ स्वाहा॒न्तरि॑क्षं गच्छ॒ स्वाहा॑ दे॒वꣳ स॑वि॒तारं॑ गच्छ॒ स्वाहा॑ मि॒त्रावरु॑णौ गच्छ॒ स्वाहा॑होरा॒त्रे ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ छन्दा॑सि गच्छ॒ स्वाहा॒ द्या॑वापृथि॒वी ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ य॒ज्ञं ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ सोमं॑ गच्छ॒ स्वाहा॑ दि॒व्यं नभो॑ गच्छ॒ स्वाहा॒ग्निं वै॑श्वान॒रं ग॑च्छ॒ स्वाहा॒ मनो॑ मे॒ हार्दि॑ यच्छ॒ दिवं॑ ते धू॒मो ग॑च्छतु॒ स्वर्ज्योतिः॑ पृथि॒वीं भस्म॒नापृ॑ण॒ स्वाहा॑॥२१॥

स॒मु॒द्रम्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। अ॒न्तरिक्ष॑म्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। दे॒वम्। स॒वि॒तार॑म्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। मि॒त्रावरु॑णौ। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। अ॒हो॒रा॒त्रेऽइत्य॑होरा॒त्रे। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। छन्दा॑ꣳसि। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावापृथि॒वी। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। य॒ज्ञम्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। सोम॑म्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। दि॒व्यम्। नभः॑। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। अ॒ग्निम्। वै॒श्वा॒न॒रम्। ग॒च्छ॒। स्वाहा॑। मनः॑। मे॒। हार्दि॑। य॒च्छ॒। दिव॑म्। ते॒। धू॒मः। ग॒च्छ॒तु॒। स्वः॑। ज्योतिः॑। पृ॒थि॒वीम्। भस्म॑ना। आ। पृ॒ण॒। स्वाहा॑ ॥२१॥

Mantra without Swara
समुद्रङ्गच्छ स्वाहान्तरिक्षङ्गच्छ स्वाहा देवँ सवितारङ्गच्छ स्वाहा मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा अहोरात्रे गच्छ स्वाहा छन्दाँसि गच्छ स्वाहा द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञङ्गच्छ स्वाहा सोमङ्गच्छ स्वाहा दिव्यन्नभो गच्छ स्वाहा अग्निँवैश्वानरङ्गच्छ स्वाहा मनो मे हार्दि यच्छ । दिवन्ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्यातिः पृथिवीम्भस्मनापृण स्वाहा ॥

समुद्रम्। गच्छ। स्वाहा। अन्तरिक्षम्। गच्छ। स्वाहा। देवम्। सवितारम। गच्छ। स्वाहा। मित्रावरुणौ। गच्छ। स्वाहा। अहोरात्रेऽइत्यहोरात्रे। गच्छ। स्वाहा। छन्दाꣳसि। गच्छ। स्वाहा। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। गच्छ। स्वाहा। यज्ञम्। गच्छ। स्वाहा। सोमम्। गच्छ। स्वाहा। दिव्यम्। नभः। गच्छ। स्वाहा। अग्निम्। वैश्वानरम्। गच्छ। स्वाहा। मनः। मे। हार्दि। यच्छ। दिवम्। ते। धूमः। गच्छतु। स्वः। ज्योतिः। पृथिवीम्। भस्मना। आ। पृण। स्वाहा॥२१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजकर्म करने में समर्थ विद्वन् ! तू (स्वाहा) बड़ी नौका आदि, विद्या से सिद्ध किये यान से (समुद्रम्) जलों के गति-स्थल समुद्र में (गच्छ) जा। (स्वाहा) खगोल को प्रकाशित करने वाली विद्या से सिद्ध किये विमान से (अन्तरिक्षम्) आकाश में (गच्छ) जा। (स्वाहा) वेदवाणी वा सत्सङ्ग से परिष्कृत वाणी से (देवम्) प्रकाशस्वरूप (सवितारम्) परमेश्वर को (गच्छ) जान। (स्वाहा) योग विद्या से (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान को (गच्छ) प्राणायाम के अभ्यास से जान। (स्वाहा) ज्योतिषविद्या से (अहोरात्रे) दिन और रात को (गच्छ) कालविद्या से जान वा प्राप्त कर। (स्वाहा) वेदाङ्ग आदि विज्ञान-युक्त वाणी से [छन्दांसि] ऋग्, यजुः, साम, अथर्व चार वेदों को [गच्छ] पठन-पाठन पूर्वक श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार से जान [स्वाहा] भूमियान, आकाशयान की रचनाएवं भूगोल, भूगर्भ तथा खगोलविद्या से [द्यावापृथिवी] भूमि और सूर्य तथा उनके अन्तर्गत देश-देशान्तरों को [गच्छ] जान। (स्वाहा) वेदवाणी से (यज्ञम्) अग्निहोत्र, शिल्प और राजव्यवहार को (गच्छ) जान। (स्वाहा) वैद्यकशास्त्र की विद्या से (सोमम्) औषधियों को (गच्छ) जान। (स्वाहा) तद्गुणविज्ञापक वाणी से (दिव्यम्) व्यवहार में लाने योग्य शुद्ध (नभः) जल को (गच्छ) प्राप्त कर। (स्वाहा) तत्बोधक वाणी से (अग्निम्) विद्युत् को (वैश्वानरम्) और सर्वत्र प्रकाशमान अग्नि को (गच्छ) जान। (मे) मेरे (मनः) चित्त को (हार्दि) प्रीतियुक्त (यच्छ) कर। (ते) तेरा (धूमः) यन्त्रों की अग्नि की भाप (दिवम्) सूर्य की (ज्योतिः) ज्योति को (स्व:) सुखपूर्वक (गच्छतु) प्राप्त हो। (त्वम्) तू (स्वाहा) यज्ञानुष्ठान और यन्त्र बनाने की विद्या से (भस्मना) धूल से पृथिवी को (आपृण) भर दे।। ६। २१।।
Essence
धर्म आदि, राज्य और व्यापार वृत्ति के अभिलाषी मनुष्य भूमियान, अन्तरिक्षयान, आकाशयान और विविध यन्त्रकला की रचनाओं से सब सामग्री सिद्ध करके द्रव्यों का संचय करें।। ६। २१।।
Subject
अब राज्यकर्म करने योग्य शिष्य को गुरु क्या-क्या उपदेश करे, यह कहा है।।
Refrences
(अहोरात्रे) यहाँ 'हेमन्त शिशिरावहोरात्रे च छन्दसि (अ० २। ४। २८) सूत्र से नपुंसक लिङ्ग है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।८।४।११-१८ तथा ८। ५।१-५ ) में की गई है।। ६। २१।।
Commentary Essence
राजकर्म करने के योग्य शिष्य को गुरु का उपदेश--हे धर्म आदि, राज्य और व्यापार करने के अभिलाषी विद्वान्! तू विशाल नौका आदि की रचना करके समुद्र-यात्रा कर, विमान बनाकर आकाश में विचरण कर, वेदवाणी तथा श्रेष्ठ जनों के सङ्ग से प्रकाशस्वरूप परमेश्वर को जान, योगविद्या से एवं प्राणायाम के अभ्यास से प्राण और उदान को जान, ज्योतिष विद्या से एवं काल विद्या से दिन और रात्रि को समझ, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष--इन वेदाङ्गों से ऋग्, यजुः, साम और अथर्व--इन चार वेदों को पठन-पाठन पूर्वक श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार से जान। भूमियान, आकाशयान की रचना भूगोल, भूगर्भ और खगोलविद्या से भूमि तथा सूर्य और इनके अन्तर्गत देश-देशान्तरों को जान। होम आदि क्रिया से अग्निहोत्र, शिल्प और राजव्यवहार आदि को जान। वैद्यकशास्त्र के बोध से औषधियों को जान। जल के गुणों की ज्ञापक विद्या से व्यवहार में लाने योग्य शुद्ध जल को प्राप्त कर। विद्युत् का बोध कराने वाली विद्या से विद्युत् तथा सर्वत्र प्रकाशमान अग्नि को जान। हृदय से अत्यन्त प्रेम करने वाले मेरे चित्त को अपने चित्त में धारण कर। तेरे यन्त्रों की अग्नि की भाप सूर्य की ज्योति को प्राप्त करे। तू यज्ञानुष्ठान औरयन्त्र बनाने की विद्या सेउत्पन्न धूल से इस पृथिवी को भर दे। इस प्रकार सब सामग्री तैयार करके द्रव्यों का संचय कर।। ६। २१।।