Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 14

37 Mantra
6/14
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
वाचं॑ ते शुन्धामि प्रा॒णं ते॑ शुन्धामि॒ चक्षुस्॑ते शुन्धामि॒ श्रोत्रं॑ ते शुन्धामि॒ नाभिं॑ ते शुन्धामि॒ मेढ्रं॑ ते शुन्धामि पा॒युं ते॑ शुन्धामि च॒रित्राँ॑स्ते शुन्धामि॥१४॥

वाच॑म्। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒। प्रा॒णम्। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒। चक्षुः॑। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒। श्रोत्र॑म्। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒। नाभि॑म्। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒। मेढ्र॑म्। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒। पा॒युम्। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒। च॒रित्रा॑न्। ते॒। शु॒न्धा॒मि॒ ॥१४॥

Mantra without Swara
वाचन्ते शुन्धामि प्राणन्ते शुन्धामि चक्षुस्ते शुन्धामि श्रोत्रन्ते शुन्धामि नाभिन्ते शुन्धामि मेढ्र्रन्ते शुन्धामि पायुन्ते शुन्धामि चरित्राँस्ते शुन्धामि ॥

वाचम्। ते। शुन्धामि। प्राणम्। ते। शुन्धामि। चक्षुः। ते। शुन्धामि। श्रोत्रम्। ते। शुन्धामि। नाभिम्। ते। शुन्धामि। मेढ्रम्। ते। शुन्धामि। पायुम्। ते। शुन्धामि। चरित्रान्। ते। शुन्धामि॥१४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे शिष्य ! विविध शिक्षाओं से मैं (ते) तेरी (वाचम्) भाषण के साधन वाणी को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ, (ते) तेरे (प्राणम्) जीवन के हेतु प्राण को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ, (ते) तेरे (चक्षुः) दर्शन के साधन नेत्र को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ, (ते) तेरे (श्रोत्रम्) सुनने के साधन श्रोत्र को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ, (ते) तेरी (नाभिम्) बन्धन रूप नाभि को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ, (ते) तेरी (मेढ्रम्) मूत्र और वीर्य का सेवन करने वाली उपस्थ इन्द्रिय को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ, (ते) तेरी (पायुम्) पालक गुदेन्द्रिय को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ और (ते) तेरे (चरित्रान्) सब व्यवहारों को (शुन्धामि) निर्मल करता हूँ।। ६। १४।।
Essence
गुरु और गुरुपत्नियाँ वेद, उपवेद, वेदाङ्ग और उपाङ्गकी शिक्षा से देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण, आत्मा और मन की शुद्धि, शरीर की पुष्टि तथा प्राणों की सन्तुष्टि प्रदान करके सब कुमारों और कुमारियों को अच्छे गुणों में प्रवृत्त करें ॥ ६। १४।।
Subject
अब वे गुरुपत्नी और गुरुजन यथायोग्य शिक्षा से अपने-अपने विद्यार्थियों को अच्छे गुणों में कैसे प्रकाशित करते हैं, यह उपदेश किया है।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।८।२।६) में की गई है।। ६। १४।।
Commentary Essence
गुरुपत्नियाँ और गुरुजन कैसे यथायोग्य शिक्षा से अपने-अपने शिष्यों को सद्गुणों में प्रवृत्त करते हैं--गुरुपत्नियाँ अपनी शिष्या ब्रह्मचारिणी कुमारियों को तथा गुरुजन अपने शिष्य ब्रह्मचारी कुमारों को इस प्रकार यथायोग्य शिक्षा देकर सद्गुणों में प्रवृत्त करें कि हे शिष्य! मैं वेद, उपवेद, वेदाङ्ग, उपाङ्ग की शिक्षा से तेरी वाणी को शुद्ध करता हूँ। तेरे जीवन हेतु प्राणों को निर्मल करता हूँ, तेरे नेत्रों को, तेरे श्रोत्रों को, तेरी नाभि को, तेरी उपस्थ इन्द्रिय को, तेरी गुदेन्द्रिय को तथा तेरे सब व्यवहारों को निर्मल करता हूँ अर्थात् तेरी देह, अन्तःकरण, आत्मा और मन की शुद्धि, शरीर की पुष्टि और प्राणों की सन्तुष्टि प्रदान करके श्रेष्ठ गुणों में प्रवृत्त करता हूँ।। ६। १४।।