Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 40

43 Mantra
5/40
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आगस्त्य ऋषिः Chhand- निचृत् ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अग्ने॑ व्रतपा॒स्त्वे व्र॑तपा॒ या तव॑ त॒नूर्मय्यभू॑दे॒षा सा त्वयि॒ यो मम॑ त॒नूस्त्वय्यभू॑दि॒यꣳ सा मयि॑। य॒था॒य॒थं नौ॑ व्रतपते व्र॒तान्यनु॑ मे दी॒क्षां दी॒क्षाप॑ति॒रम॒ꣳस्तानु॒ तप॒स्तप॑स्पतिः॥४०॥

अग्ने॑। व्र॒त॒पा॒ इति॑ व्रतऽपाः। ते॒। व्र॒त॒पा॒ इति॑ व्रतऽपाः। या। तव॑। त॒नूः। मयि॑। अभू॑त्। ए॒षा। सा। त्वयि॑। योऽइति॒ यो। मम॑। तनूः। त्वयि॑। अभू॑त्। इ॒यम्। सा। मयि॑। य॒था॒य॒थमिति॑ यथाऽय॒थम्। नौ। व्र॒त॒प॒त॒ इति॑ व्रतऽपते। व्र॒तानि॑। अनु। मे॒। दी॒क्षाम्। दी॒क्षाप॑ति॒रिति॑ दीक्षाऽप॑तिः। अमं॑स्त। अनु॑। तपः॑। तप॑स्पति॒रिति॒ तपः॑ऽपतिः ॥४०॥

Mantra without Swara
अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा या तव तनूर्मय्यभूदेषा सा त्वयि यो मम तनूस्त्वय्यभूदियँ सा मयि । यथायथन्नौ व्रतपते व्रतान्यनु मे दीक्षान्दीक्षापतिरमँस्तानु तपस्तपस्पतिः ॥

अग्ने। व्रतपा इति व्रतऽपाः। ते। व्रतपा इति व्रतऽपाः। या। तव। तनूः। मयि। अभूत्। एषा। सा। त्वयि। योऽइति यो। मम। तनूः। त्वयि। अभूत्। इयम्। सा। मयि। यथायथमिति यथाऽयथम्। नौ। व्रतपत इति व्रतऽपते। व्रतानि। अनु। मे। दीक्षाम्। दीक्षापतिरिति दीक्षाऽपतिः। अमंस्त। अनु। तपः। तपस्पतिरिति तपःऽपतिः॥४०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
(व्रतपाः) सत्य का पालन करने वाले (अग्ने) विज्ञान से समुन्नत विद्वान्! आप जैसे मेरे (व्रतपाः) सत्य व्रतों का पालन करने वाले आचार्य (अभूत्) हो, वैसे मैं (ते) आपके बतलाये व्रतों का पालन करने वाला बनूँ। और--
जो आपका (तनूः) विद्यादि कार्यों में व्याप्ति का निमित्त शरीर है, वह (मयि) आपके सखा मुझ में रहे। और जो (एषा) यह (त्वयि) मेरे मित्र आप में बुद्धि है, वह (मयि) मुझ में हो। और--
(यो) जो (मम) मेरा (तनूः) विद्या का विस्तार है (सा) वह (त्वयि) मेरे अध्यापक में हो ।
हे (व्रतपते) सत्य भाषण आदि व्रतों के रक्षक! जैसे यह व्यक्ति व्रतपति है, वैसे आप और मैं एवं दोनों मित्र मिलकर (यथायथम्) वास्तव में उसके (व्रतानि) सत्य व्यवहार आदि व्रतों का अनुकरण करें।
हे मित्र ! जैसे आपका (दीक्षापतिः) व्रतादेशों का पालन करने वाला आचार्य तुझे (दीक्षाम्) व्रतोपदेश को (अमँस्त) समझता है, वैसे (मे) मेरे (दीक्षाम्) व्रतोपदेश को भी बतलाये।
जैसे (ते) आपका (तपस्पतिः) ब्रह्मचर्य आदि का पालन करने वाला आचार्य आपको (तपः) पहले कष्ट और बाद में आनन्द देने वाले ब्रह्मचर्य की (अन्वमँस्त) शिक्षा देता है, वैसे (मे) मेरा (तपस्पतिः) ब्रह्मचर्य्य आदि का पालन करने वालाआचार्य मेरे (तपः) पहले कष्ट और बाद में आनन्द देने वाले ब्रह्मचर्य की (अमँस्त) शिक्षा करे। ५ । ४० ।।
Essence
जैसे पहले विद्वानों को बनाने वाले अध्यापक लोग हुये हैं वैसे हम भी बनें ।
जब तक सब मनुष्य सुख-दुःख तथा हानि-लाभ की व्यवस्था में परस्पर अपनी आत्मा के समान वर्ताव नहीं करते हैं तब तक पूर्ण सुख को प्राप्त नहीं होते। इसलिये इस वेदोक्त सत्यव्यवहार का आचरण सब मनुष्य क्यों न करें ।। ५ । ४० ।।
Subject
फिर वे आचार्य और शिष्य कैसे बर्ताव करें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।६।३।२१) में की गई है ।। ५ । ४० ।।
Commentary Essence
आचार्य और शिष्य कैसे हों--विद्वान् आचार्य सत्य-भाषण आदि सत्य व्रतों का पालन करने वाला और विज्ञान में समुन्नत होता है। वह अपने पूर्वज अध्यापकों के समान व्रतपालक बनकर अपने शिष्यों को भी व्रतपालक बनाता है। शिष्य लोग आचार्य की शारीरिक सेवा करते हैं तथा आचार्य के पास विद्यमान बुद्धि, विद्या आदि गुणों को उनके प्रिय होकर ग्रहण करते हैं। शिष्य भी अपने शरीर को तथा अपनी विद्या को भी आचार्य में अर्पित कर देते हैं। प्राप्त की हुई विद्या को आचार्य की ही कृपा समझते हैं।
आचार्य और शिष्य किसी अन्य व्रतपति को देखकर बड़े उत्साहित होते हैं। उससे दोनों यह प्रेरणा लेते हैं कि जैसे यह व्यक्ति व्रतपति बना है इसी प्रकार हम दोनों परस्पर सखा होकर यथार्थ रूप में इस व्रतपति के सत्याचरण रूप व्रतों का अनुकरण करें ।
शिष्य आचार्य से प्रार्थना करता है कि हे आचार्य ! आप मेरे हितकारी मित्र हो। जैसे आपके दीक्षापति (व्रतादेशों के पालक) आचार्य ने आपको दीक्षा दी है वैसे आप मुझे भी दीक्षित कीजिये। और जैसे आपके तप-पति (ब्रह्मचर्य आदि व्रतों के पालक) आचार्य ने आपको प्रारम्भ में कष्टदायक प्रतीत होने वाले तथा परिणाम में आनन्द देने वाले ब्रह्मचर्य आदि तप की शिक्षा दी है वैसे आप मेरे तप पति बन कर मुझे आनन्द-प्रद ब्रह्मचर्य आदि तप-आचरण की शिक्षा कीजिये ।
भाव यह है कि आचार्य और शिष्य के समान सब मनुष्य सुख-दुःख हानि-लाभ में परस्पर आत्मवत् प्रेम-पूर्वक व्यवहार करके पूर्ण सुख को प्राप्त करें ।। ५ । ४० ।।