Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 4

43 Mantra
5/4
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्नाव॒ग्निश्च॑रति॒ प्रवि॑ष्ट॒ऽऋषी॑णां पु॒त्रोऽअ॑भिशस्ति॒पावा॑। स नः॑ स्यो॒नः सु॒यजा॑ यजे॒ह दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यꣳ सद॒मप्र॑युच्छ॒न्त्स्वाहा॑॥४॥

अ॒ग्नौ। अ॒ग्निः। च॒र॒ति॒। प्रविष्ट॑ इति॒ प्रऽवि॒ष्टः। ऋषी॑णाम्। पु॒त्रः। अ॒भि॒श॒स्ति॒पावेत्य॑भिशस्ति॒ऽपावा॑। सः। नः॒। स्यो॒नः। सु॒यजेति॑ सु॒ऽयजा॑। य॒ज॒। इ॒ह। दे॒वेभ्यः॑। ह॒व्यम्। सद॑म्। अप्र॑युच्छ॒न्नित्यप्र॑ऽयुच्छन्। स्वाहा॑ ॥४॥

Mantra without Swara
अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋषीणाम्पुत्रोऽअभिशस्तिपावा । स नः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्यँ सदमप्रयुच्छन्त्स्वाहा ॥

अग्नौ। अग्निः। चरति। प्रविष्ट इति प्रऽविष्टः। ऋषीणाम्। पुत्रः। अभिशस्तिपावेत्यभिशस्तिऽपावा। सः। नः। स्योनः। सुयजेति सुऽयजा। यज। इह। देवेभ्यः। हव्यम्। सदम्। अप्रयुच्छन्नित्यप्रऽयुच्छन्। स्वाहा॥४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (अभिशस्तिपावा) सब ओर से हिंसा करने वालों से रक्षा करने वाला (अग्नौ) विज्ञान से बिजुली में (प्रविष्टः) प्रवेश करने वाला (ऋषिणाम्) वेद के विद्वानों से (पुत्रः) पढ़ाया हुआ (स्योनः) सुखदायक है, वह (सुयजा) श्रेष्ठ यज्ञ से (अग्निः) विद्वान् मनुष्य (अप्रयुच्छन्) प्रमाद रहित होकर (चरति) विचरण करता है, और जो हमारे लिए (इह) इस जगत् में ( देवेभ्यः) विद्वानों का दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिये (हव्यम्) देने और लेने योग्य पदार्थ तथा (सदस्) जानने तथा प्राप्त करने योग्य पदार्थ की (स्वाहा) एवं श्रेष्ठ अन्नादि की हवि प्रदान करता है, उस विद्वान् से हम मेल करें ।। ५ । ४ ॥
Essence
इस संसार में जो अग्नि कार्यकारण भेद से दो प्रकार की है, कार्यरूप सूर्य आदि में तथा कारण रूप विद्युत् सब भौतिक पदार्थों में प्रविष्ट है, उस विद्युत् में विज्ञान के द्वारा प्रविष्ट होकर और इन दोनों अग्नियों का ठीक-ठीक प्रयोग करके सब मनुष्य इनका कार्यों में उपयोग करें ॥ ५ । ४॥
Subject
विद्युत् और विद्वान् अग्नि कैसे हैं, इस विषय का उपदेश किया है।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३ ।४ ।१ ।२५) में की गई है ॥ ५ । ४ ॥
Commentary Essence
१. अग्नि (विद्युत्) कैसा है--अग्नि कार्य और कारण भेद से दो प्रकार का है। कार्य रूप अग्नि सूर्य आदि में हैं तथा कारण रूप अग्नि अर्थात् विद्युत् सब भौतिक पदार्थों में प्रविष्ट है जो दुःखों से रक्षा करता है। जिसमें विज्ञान के द्वारा प्रविष्ट होकर विद्वान् पुरुष प्रमाद रहित होकर गति को प्राप्त करते हैं। यह विद्वानों के लिये देने-लेने योग्य पदार्थों को, विज्ञान को और अन्न आदि को प्राप्त कराता है।
२. अग्नि (विद्वान्) कैसा हो--अग्नि अर्थात् विद्वान् पुरुष विद्युत् में विज्ञान के द्वारा प्रविष्ट होकर उसका सदुपयोग करता है। उससे कष्टों का निवारण करता है। उक्त विद्वान् वेदार्थ के ज्ञाता ऋषियों का सुशिक्षित, सुखकारी पुत्र होता है। जो उत्तम यज्ञ के द्वारा प्रमादरहित होकर विचरण करता है तथा सब मनुष्यों के लिए देवों के प्रिय पदार्थ एवं विज्ञान को तथा अन्न आदि को प्राप्त कराता है। अतः सब मनुष्य ऐसे विद्वान् पुरुषों का संग करें।
३. समीक्षा--यहाँ महीधर ने लिखा है कि 'दशाक्षरैश्चतुर्भिः पादैर्विराट्' अर्थात् दश अक्षर वाले चार चरणों से विराट् छन्द है। महीधर का अपने शब्दों में लिखा छन्द-लक्षण मन्त्र में नहीं घटता। मन्त्र में प्रत्येक चरण में दश अक्षर नहीं हैं। किन्तु प्रथम चरण में १०, दूसरे में ११, तीसरे में १० और चौथे में १३ अक्षर हैं। इस प्रकार सब मिलाकर ४४ अक्षर होते हैं। अतः यह ४४ अक्षर का आर्षी त्रिष्टुप् छन्द है; विराट् नहीं। महीधर छन्दोज्ञान से भी शून्य हैं ॥ ५ । ४ ॥