Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 39

43 Mantra
5/39
Devata- सोमसवितारौ देवते Rishi- आगस्त्य ऋषिः Chhand- साम्नी बृहती,निचृत् आर्षी पङ्क्ति, Swara- मध्यमः, पञ्चमः
Mantra with Swara
देव॑ सवितरे॒ष ते॒ सोम॒स्तꣳ र॑क्षस्व॒ मा त्वा॑ दभन्। ए॒तत्त्वं दे॑व सोम दे॒वो दे॒वाँ२ऽउपागा॑ऽइ॒दम॒हं म॑नु॒ष्यान्त्स॒ह रा॒यस्पोषे॑ण॒ स्वाहा॒ निर्वरु॑णस्य॒ पाशा॑न्मुच्ये॥३९॥

देव॑। स॒वि॒तः॒। ए॒षः। ते॒। सोमः॑। तम्। र॒क्ष॒स्व॒। मा। त्वा॒। द॒भ॒न्। ए॒तत्। त्वम्। दे॒व॒। सो॒म॒। दे॒वः। दे॒वान्। उप॑। अ॒गाः॒। इ॒दम्। अ॒हम्। म॒नु॒ष्या॒न्। स॒ह। रा॒यः। पोषे॑ण। स्वाहा॑। निः। वरु॑णस्य। पाशा॑त्। मु॒च्ये॒ ॥३९॥

Mantra without Swara
देव सवितरेष ते सोमस्तँ रक्षस्व मा त्वा दभन् । एतत्त्वन्देव सोम देवो देवाँऽउपागा इदमहम्मनुष्यान्त्सह रायस्पोषेण स्वाहा निर्वरुणस्य पाशान्मुच्ये ॥

देव। सवितः। एषः। ते। सोमः। तम्। रक्षस्व। मा। त्वा। दभन्। एतत्। त्वम्। देव। सोम। देवः। देवान्। उप। अगाः। इदम्। अहम्। मनुष्यान्। सह। रायः। पोषेण। स्वाहा। निः। वरुणस्य। पाशात्। मुच्ये॥३९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (देव) सकल विद्या के प्रकाशक (सवितः) ऐश्वर्यवान् सभाध्यक्ष ! जैसे मैं आपकी सहायता से अपने ऐश्वर्य की रक्षा करता है, वैसे आप जो यह (ते) आपकी (सोमः) ऐश्वर्य राशि है उसकी रक्षा करो। और--
जैसे मुझे शत्रु नहीं दबाते हैं, वैसे (त्वा) तुझे भी हमारी सहायता से (मा दभत्) न दबावें ।
हे (देव) सुखदाता! (सोम) श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाले (देव:) विद्या से प्रकाशित (त्वम्) सभापति राजा, आप जैसे (एतत्) इन (देवान्) दिव्य गुणों वाले विद्वानों के (उपागाः) समीप जाते हैं, वैसे मैं भी उनके संग में रहूँ और--
जैसे मैं (इदम्) आप के द्वारा किये कार्य का अनुष्ठान करके (रायः) धनों की (पोषेण) पुष्टि से युक्त होकर (मनुष्यान्) विचारशील लोगों को तथा (देवान्) दिव्यगुणों वाले विद्वानों को प्राप्त कर (वरुणस्य) दुःख से आच्छादित करने वाले एवं तिरस्कार करने वाले वरुण के (पाशात्) बन्धन से (निर्मुच्ये) मुक्त होता हूँ वैसे तू भी मुक्त हो ।। ५ । ३९।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ॥ सब मनुष्यों को यह योग्य है कि वे अप्राप्त ऐश्वर्य की पुरुषार्थ से प्राप्ति तथा उसकी रक्षा और उन्नति करके, धार्मिक मनुष्यों का संग तथा ऐश्वर्य से उनका सत्कार करके, धर्मानुष्ठान कर और विज्ञान की उन्नति करके दुःखबन्धन से मुक्त हों ।। ५ । ३९।।
Subject
सभाध्यक्ष, राजा और प्रजा कैसी हैं, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
(रक्षस्व) यहाँ व्यत्यय से आत्मनेपद है। (दभन्) यहाँ लिङ्-अर्थ में लङ् लकार और अट् का अभाव है। इस मन्त्र की शत. (३।६।३। १८-२० ) में की गई है ।। ५ ।३९।।
Commentary Essence
सभाध्यक्ष राजा और प्रजा कैसी हो—सब विद्याओं को प्रकाशित करने वाला, ऐश्वर्यवान्, सुखदायक, सन्मार्ग में प्रेरणा करने वाला सभाध्यक्ष राजा हो। राजा और प्रजा परस्पर के सहयोग से ऐश्वर्य की रक्षा करें, परस्पर ऐसा व्यवहार रखें कि उन्हें शत्रु दबा न सकें, हिंसन न कर सकें, दोनों धार्मिक विद्वान् मनुष्यों का संग करें। इस प्रकार परस्पर के प्रेम-पूर्ण व्यवहार से अप्राप्त ऐश्वर्य की पुरुषार्थ से प्राप्ति करके उसका पोषण करें अर्थात् उसकी रक्षा और उन्नति करें। विचारशील धार्मिक विद्वान् मनुष्यों के संग से धर्मानुष्ठान करके विज्ञान को बढ़ाकर दुःख बन्धन से मुक्त हों ।
२. अलङ्कार– मन्त्र में उपमावाचक ‘इव’ आदि शब्द लुप्त हैं, इसलिये वाचकलुप्तोपमाअलङ्कार है। उपमा यह है कि राजा के समान प्रजा, और प्रजा के समान राजा परस्पर ऐश्वर्य की प्राप्ति, रक्षा और उन्नति आदि कार्य करें ॥