Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 37

43 Mantra
5/37
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आगस्त्य ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं नो॑ऽअ॒ग्निर्वरि॑वस्कृणोत्व॒यं मृधः॑ पु॒रऽए॑तु प्रभि॒न्दन्। अ॒यं वाजा॑ञ्जयतु॒ वाज॑साताव॒यꣳ शत्रू॑ञ्जयतु॒ जर्हृ॑षाणः॒ स्वाहा॑॥३७॥

अ॒यम्। नः॒। अ॒ग्निः। वरि॑वः। कृ॒णो॒तु॒। अ॒यम्। मृधः॑। पु॒रः। ए॒तु॒। प्र॒भि॒न्दन्निति॑ प्रऽभि॒न्दन्। अ॒यम्। वाजा॑न्। ज॒य॒तु॒। वाज॑साता॒विति॒ वाज॑ऽसातौ। अ॒यम्। शत्रू॑न्। ज॒य॒तु॒। जर्हृ॑षाणः। स्वाहा॑ ॥३७॥

Mantra without Swara
अयन्नोऽअग्निर्वरिवस्कृणोत्वयम्मृधः पुर एतु प्रभिन्दन् । अयँ वाजाञ्जयतु वाजसातावयँ शत्रूञ्जयतु जर्हृषाणः स्वाहा ॥

अयम्। नः। अग्निः। वरिवः। कृणोतु। अयम्। मृधः। पुरः। एतु। प्रभिन्दन्निति प्रऽभिन्दन्। अयम्। वाजान्। जयतु। वाजसाताविति वाजऽसातौ। अयम्। शत्रून्। जयतु। जर्हृषाणः। स्वाहा॥३७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
यह (अग्निः) परमेश्वर का उपासक शूरवीर मनुष्य, जो स्वयं प्रकाशमान अग्नि के समान पापियों का दहन करने वाला है, वह (नः) हमारी प्रजा के प्राणियों की (वरिवः) सुरक्षा (कृणोतु) करे।
जैसे [अयम्] कोई युद्धकुशल वीर (वाजसातौ) युद्ध में (मृधः) निन्दनीय (शत्रून्) शत्रुओं के (पुरः) सामने (एति) डट जाता है वैसे ही (अयम्) यह भी वीरों को प्रसन्न करने वाला है और जैसे कोईवीर (मृध:) निन्दनीय (शत्रून्) शत्रुओं का एवं (प्रभिन्दन्) शत्रु दल का विदारण करने वाला (वाजान्) संग्रामों को (जयतु) विजय करके (पुरः) सामने (एतु) आता है, वैसे (अयम्) यह वीर विजय को प्राप्त करने वाला (जर्हृषाण:) अत्यन्त हर्षित होकर (स्वाहा) उत्तम वाणी बोलता हुआ (जयतु) विजय को प्राप्त करे ।। ५ । ३७ ।।
Essence
जो मनुष्य परमेश्वर की उपासना नहीं करते उनकी सर्वत्र विजय नहीं होती, और जो सुशिक्षित वीरों का सत्कार करके सेना की रक्षा नहीं करते उनकी सर्वत्र पराजय होती है।
इसलिये परमेश्वर की उपासना और वीरों का सत्कार इन दो कार्यों का मनुष्य सदा अनुष्ठान करें ।। ५ । ३७ ।।
Subject
फिर ईश्वर की उपासना करने हारे शूरवीर के गुणों का उपदेश किया है।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।६।३।१२ ) में की गई है ॥ ५ । ३७ ।।
Commentary Essence
शूर के गुण--शूर पुरुष परमेश्वर का उपासक, स्वयं प्रकाशमान अग्नि के समान पापियों को दग्ध करने वाला, और प्रजा का संरक्षक होता है। जो शूर पुरुष परमेश्वर की उपासना नहीं करते उनको सर्वत्र विजय प्राप्त नहीं होती। और जो नेता शूर-वीरों का सत्कार करके सेना की रक्षा नहीं करते उनकी सर्वत्र पराजय होती है। क्योंकि युद्ध कुशल शूर पुरुष ही संग्राम में दुष्ट शत्रुओं के सामने डट जाता है तथा वीरों में हर्ष की वर्षा करता है। शूर पुरुष ही निन्दनीय शत्रुओं का एवं शत्रुदल का विदारण करके संग्राम में विजय प्राप्त करता है। जब वह शूर अन्य वीरों के सामने जाता है तब विजय प्राप्त करने वाले वीर पुरुष अत्यन्त प्रसन्न होकर उसकी प्रशंसा में सुन्दर वाणी बोलते हैं। स्वाहा-स्वाहा (वाह-वाह) कहते हैं और विजय प्राप्त करते हैं ।। ५ । ३७ ।।