Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 28

43 Mantra
5/28
Devata- यज्ञो देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- आर्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ध्रु॒वासि॑ ध्रु॒वोऽयं यज॑मानो॒ऽस्मिन्ना॒यत॑ने प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भूयात्। घृ॒तेन॑ द्यावापृथिवी पूर्येथा॒मिन्द्र॑स्य छ॒दिर॑सि विश्वज॒नस्य॑ छा॒या॥२८॥

ध्रु॒वा। अ॒सि॒। ध्रु॒वः। अ॒यम्। यज॑मानः। अ॒स्मिन्। आ॒यत॑न॒ इत्या॒ऽयत॑ने। प्र॒जयेति॑ प्र॒ऽजया॑। प॒शुभि॒रिति॑ प॒शुऽभिः॑। भू॒या॒त्। घृ॒तेन॑। द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ऽइति॑ द्यावापृथिवी। पू॒र्ये॒था॒म्। इन्द्र॑स्य। छ॒दिः। अ॒सि॒। वि॒श्व॒ज॒नस्येति॑ विश्वऽज॒नस्य॑। छा॒या ॥२८॥

Mantra without Swara
धु्रवासि धु्रवो यँयजमानो स्मिन्नायतने प्रजया पशुभिर्भूयात् । घृतेन द्यावापृथिवी पूर्येथामिन्द्रस्य च्छदिरसि विश्वजनस्य च्छाया ॥

ध्रुवा। असि। ध्रुवः। अयम्। यजमानः। अस्मिन्। आयतन इत्याऽयतने। प्रजयेति प्रऽजया। पशुभिरिति पशुऽभिः। भूयात्। घृतेन। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। पूर्येथाम्। इन्द्रस्य। छदिः। असि। विश्वजनस्येति विश्वऽजनस्य। छाया॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे यज्ञ करने वाली यजमान की पत्नी! जैसे तू (अस्मिन्) इस (आयतने) प्राणियों के आगमन स्थान जगत् में, अपने घर में अथवा यज्ञ में (प्रजया) राज्य वा सन्तानों (पशुभिः) हाथी, घोड़े, गाय आदि पशुओं के साथ (ध्रुवा) स्थिर (असि) है वैसे (अयम्) यह (यजमानः) यज्ञ करने वाला यजमान भी (ध्रुवः) स्थिर है ।
तुम दोनों (घृतेन) घृत आदि से यज्ञ करके (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि को (पूर्येथाम्) सुख से भरपूर करो ।
तू यजमान वा यजमानपत्नी (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य को (छदिः) दुःख निवारक होने से प्राप्त करने वाला वा प्राप्त करने वाली (असि) है, (विश्वजनस्य) जगत् के सब लोगों के (छाया) दुःख का उच्छेद करने वाला आश्रय है, जिसके संग से सब प्राणी सुखी हों। इसलिए हम उस यजमानपत्नी तथा यजमान की प्रशंसा करते हैं ॥ ५ ॥ २८ ॥
Essence
सब मनुष्य, जिन यज्ञ करने वाले यजमान तथा उसकी पत्नी से, जिस यज्ञ से स्थिर विद्या और सुखों की प्राप्ति से दुःखों का विनाश हो उनका सदा सत्कार करें तथा यज्ञ का नित्य अनुष्ठान करते रहें ।। ५ । २८ ।।
Subject
फिर उस यज्ञ से क्या होता है, इस विषय का उपदेश किया है ॥
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।६।१।१९-२२) में की गई है ॥ ५। २८ ॥
Commentary Essence
यज्ञानुष्ठान से क्या होगा--जो यज्ञ करने वाला यजमान और उसकी पत्नी भी इस संसार में अपने घर में यज्ञानुष्ठान करने में स्थिर होते हैं, जो घृतादि यज्ञसामग्री से प्रकाश और भूमि को परिपूर्ण कर देते हैं उन्हें राज्य, सन्तान, हाथी, घोड़े, गाय आदि पशु अर्थात् संसार के सब सुख प्राप्त होते हैं और सब दुःखों के नाश से परम ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। संसार उन्हें दुःखों के उच्छेद के लिये अपना आश्रय समझता है। यज्ञ से सब प्राणीसमूह सुखी होता है। इसलिये यज्ञ करने वालों की सब लोग प्रशंसा करें तथा यज्ञ का नित्य अनुष्ठान किया करें ॥ ५ । २८ ॥