Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 27

43 Mantra
5/27
Devata- यज्ञो देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- ब्राह्मी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
उद्दिव॑ꣳ स्तभा॒नान्तरि॑क्षं पृण॒ दृꣳह॑स्व पृथि॒व्यां द्यु॑ता॒नस्त्वा॑ मारु॒तो मि॑नोतु मि॒त्रावरु॑णौ ध्रु॒वेण॒ धर्म॑णा। ब्र॒ह्म॒वनि॑ क्षत्र॒वनि॑ रायस्पोष॒वनि॒ पर्यू॑हामि। ब्रह्म॑ दृꣳह क्ष॒त्रं दृ॒ꣳहायु॑र्दृꣳह प्र॒जां दृ॑ꣳह॥२७॥

उत्। दिव॑म्। स्त॒भा॒न॒। आ। अ॒न्तरि॑क्षम्। पृ॒ण॒। दृꣳह॑स्व। पृ॒थि॒व्याम्। द्यु॒ता॒नः। त्वा॒। मा॒रु॒तः। मि॒नो॒तु॒। मि॒त्राव॑रुणौ। ध्रु॒वेण॑। धर्म॑णा। ब्र॒ह्म॒वनीति॑ ब्रह्म॒ऽवनि॑। त्वा॒। क्ष॒त्र॒वनीति॑ क्षत्र॒ऽवनि॑। रा॒य॒स्पो॒ष॒वनीति॑ रायस्पोष॒ऽवनि॑। परि॑। ऊ॒हा॒मि॒। ब्रह्म॑। दृ॒ꣳह॒। क्ष॒त्रम्। दृ॒ꣳह॒। आयुः॑। दृ॒ꣳह॒। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। दृ॒ꣳह॒॑ ॥२७॥

Mantra without Swara
उद्दिवँ स्तभानान्तरिक्षम्पृण दृँहस्व पृथिव्यान्द्युतानास्त्वा मारुतो मिनोतु मित्रावरुणौ धु्रवेण धर्मणा । ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि त्वा रायस्पोषवनि पर्यूहामि । ब्रह्म दृँह क्षत्रन्दृँहायुर्दृँह प्रजान्दृँह ॥

उत्। दिवम्। स्तभान। आ। अन्तरिक्षम्। पृण। दृꣳहस्व। पृथिव्याम्। द्युतानः। त्वा। मारुतः। मिनोतु। मित्रावरुणौ। ध्रुवेण। धर्मणा। ब्रह्मवनीति ब्रह्मऽवनि। त्वा। क्षत्रवनीति क्षत्रऽवनि। रायस्पोषवनीति रायस्पोषऽवनि। परि। ऊहामि। ब्रह्म। दृꣳह। क्षत्रम्। दृꣳह। आयुः। दृꣳह। प्रजामिति प्रऽजाम्। दृꣳह॥२७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे परम विद्वान् मनुष्य! जैसे (त्वा) तुझे (मारुतः) वायु (ध्रुवेण) स्थिर (धर्मणा) धर्म से (मिनोतु) संयुक्त करता है, और (मित्रावरुणौ) प्राण तथा अपान (मिनुतः) प्रेरित करते हैं, वैसे तू कृपा करके हमारे लिये (दिवम्) विद्या प्रकाश को (उत-स्तभान) आकाश तथा वहाँ के प्राणि वर्ग को (पृण) तृप्त कर और (दृंहश्च) बढ़ा।
(पृथिव्याम्) भूमि पर (द्युतानः) श्रेष्ठ विद्यागुण का विस्तार करता हुआ सब सुखों को (दृंह) बढ़ा (ब्रह्म) विद्या को वा विद्वान् को (दृंह) बढ़ा (क्षत्रम्) राज्य को नष्ट करने वाले आघातों से रक्षा करने वाले क्षत्रिय वीर पुरुष को (दृंह) बढ़ा (आयु:) जीवन को (दृंह) बढ़ा (प्रजाम्) सन्तान को (दृंह) बढ़ा। और
(ब्रह्मवनिम्) बल विद्या का सेवन करने वाले (क्षत्रवनिम्) राज्य का सेवन करने वाले, (रायस्पोषवनिम्) धनों की पुष्टि का सेवन करने वाले आप को मैं (पर्यूहामि) सब ओर से समझता हूँ वैसे आप को सब मनुष्य सब ओर से समझें ॥ ५ । २७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ॥ हे मनुष्यो ! जैसे जगदीश्वर सत्य भाव से प्रार्थना करने पर तथा श्रेष्ठ विद्वान् सेवा करने पर सब को सुख देता है वैसे ही यह यज्ञ विद्या आदि को बढ़ाकर सब मनुष्य आदि प्राणियों को सुखी करता है, ऐसा तुम जानो ॥ ५ । २७ ।।
Subject
अच्छे प्रकार सेवन किया हुआा सभापति और अनुष्ठान किया हुआ यज्ञ क्या करता है, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
(अन्तरिक्षम्) यहाँ तात्स्थ्य उपाधि से अन्तरिक्षस्थ प्राणियों का भी ग्रहण होता है। (पृण) यहाँ'णिच्' प्रत्यय का अर्थ अन्तर्भावित है। (ब्रह्मवनि) यहाँ 'सुपां सुलुक्॰ [अ० ७ । १ । ३९] इस सूत्र से ‘अम्' विभक्ति का लुक् है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।६।१।१५-१८) में की गई है ।। ५ । २७ ।।
Commentary Essence
१. सेवा से सभाध्यक्ष क्या करता है--परम् विद्वान् सभाध्यक्ष को वायु तथा प्राण-अपान अपने निश्चल धर्म से संयुक्त करें। अर्थात् विद्वान् पुरुष वायु एवं प्राण-अपान के समान अपने धर्म पर स्थिर रहता है तथा विद्याप्रकाश को ऊँचा उठाता है, आकाश को तथा आकाशस्थ सब प्राणियों को यज्ञादि शुभ कार्य से तृप्त करता है। पृथिवी पर सद्विद्या आदि गुणों का विस्तार करता हुआ सुखों को बढ़ाता है, विद्वानों को बढ़ाता है, वीर क्षत्रियों को बढ़ाता है, आयु को बढ़ाता है, और प्रजा को बढ़ाता है। अतः बल, विद्या, राज्य तथा धनों की पुष्टि से युक्त परम विद्वान् की सब मनुष्य सेवा करें।
२. सेवन किया हुआ यज्ञ क्या करता है--परम् विद्वानों के द्वारा सेवन किया हुआ यज्ञ, वायु तथा प्राणापान के समान स्थिर धर्म से युक्त करता है, विद्या के प्रकाश को ऊँचा उठाता है, आकाश और वहाँ के प्राणियों का तर्पण करता है, पृथिवी पर सद्विद्या आदि गुणों का विस्तार करके सुखों को बढ़ाता है, विद्वान्, वीर पुरुष, जीवन और प्रजा की वृद्धि करता है। बल, विद्या, राज्य और धनों की पुष्टि प्रदान करता है। विद्वानों के समान यज्ञ का सब मनुष्य अनुष्ठान करें ।।
३. अलङ्कार--मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त होने से वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। परम विद्वानों के समान सब मनुष्य मन्त्रोक्त यज्ञ का अनुष्ठान करें यह उपमा है ।।