Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 22

43 Mantra
5/22
Devata- यज्ञो देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- साम्नी पङ्क्ति,भूरिक् आर्षी बृहती, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑दे॒ नार्य॑सी॒दम॒हꣳ रक्ष॑सां ग्री॒वाऽअपि॑ कृन्तामि। बृ॒हन्न॑सि बृ॒हद्र॑वा बृह॒तीमिन्द्रा॑य॒ वाचं॑ वद॥२२॥

दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्यामिति॒ हस्ता॑ऽभ्याम्। आद॑दे। नारी॑। अ॒सि॒। इ॒दम्। अ॒हम्। रक्ष॑साम्। ग्री॒वाः। अपि॑। कृ॒न्ता॒मि॒। बृ॒हन्। अ॒सि॒। बृ॒हद्र॑वा॒ इति॑ बृ॒हत्ऽर॑वाः। बृ॒ह॒तीम्। इन्द्रा॑य। वाच॑म्। व॒द॒ ॥२२॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । आददे नार्यसीदमहँ रक्षसाङ्ग्रीवा अपिकृन्तामि । बृहन्नसि बृहद्रवा बृहतीमिन्द्राय वाचँ वद ॥

देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्यामिति हस्ताऽभ्याम्। आददे। नारी। असि। इदम्। अहम्। रक्षसाम्। ग्रीवाः। अपि। कृन्तामि। बृहन्। असि। बृहद्रवा इति बृहत्ऽरवाः। बृहतीम्। इन्द्राय। वाचम्। वद॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य ! जैसे मैं विद्वान्(देवस्य) सर्वप्रकाशक, आनन्ददाता (सवितुः) सब जगत् के उत्पादक परमेश्वर की (प्रसवे) सृष्टि में (अश्विनोः) प्राण और अपान के वा अध्वर्युओं के (बाहुभ्याम्) बलवीर्य से (पूष्ण:) पुष्टि देने वाली पृथिवी के (हस्ताभ्याम्) आनन्ददायक धारण आकर्षणों से जिस यज्ञ को (आददे) चहुँ ओर से स्वीकार करता हूँ (त्वा) उसे तू भी वैसे ही ग्रहण कर। और-
जैसे मैं (नारी) नरों के शुभ कार्यों को तथा (इदम्) इस सबके पालक यज्ञानुष्ठान कर्म को (आददे) स्वीकार करता हूँ, वैसे तू भी ग्रहण कर । और-
जैसे मैं (रक्षसाम्) दुष्ट स्वभाव वाले राक्षसों के (ग्रीवा:) कण्ठों का (कृन्तामि) छेदन करता हूँ, वैसे तू भी छेदन कर। और-
जैसे मैं इन उक्त कार्यों को करने से (बृहद्रवा:) बड़ा स्तुति भाजन एवं (बृहन्) बड़ा कहलाता हूँ, वैसे तू भी बन। और-
जैसे मैं (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य के दाता को (बृहतीम्) महती बड़ी (वाचम्) वेदवाणी का उपदेश करता हूँ वैसे इसका तू भी (वद) उपदेश कर ।। ५ । २२ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। जैसे विद्वान् लोग ईश्वर की सृष्टि में विद्या के द्वारा पदार्थों की भली भाँति परीक्षा करके, उनका कार्यों में उपयोग कर सुखों को प्राप्त करते हैं, वैसे ही सब मनुष्य इस यज्ञ का अनुष्ठान करके सुखों को प्राप्त करें ।। ५ । २२ ।।
Subject
फिर यह यज्ञ किसलिये करना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(पूष्ण:) 'पूषा' शब्द निघं० ( १ । १) में पृथिवी नामों में पढ़ा है। (असि) अस्ति । इस मन्त्र में 'असि' पद पर सर्वत्र व्यत्यय है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।५।४।४-८) में की गई है ॥ ५ । २२ ।।
Commentary Essence
१. यज्ञ किसलिये करें-- सबके प्रकाशक, आनन्द के दाता, सकल जगत् के उत्पादक ईश्वर की सृष्टि में विद्वान् लोग प्राण-अपान के बल और वीर्य से, पुष्टिकारक पृथिवी के धारण और आकर्षण शक्ति से यज्ञ को ग्रहण करते हैं, नरों की की हुई क्रिया होने से यज्ञ क्रिया को नारी कहते हैं जो सबका पालन करने वाली है। इसलिये विद्वान् लोग इसे ग्रहण करते हैं। विद्वान् लोग राक्षसों की ग्रीवा का छेदन करते हैं क्योंकि यह भी यज्ञ है। विद्वान् बहुत उपदेश करने वाला होता है जिससे वह सर्वत्र वृद्धि को प्राप्त होता है। उपदेश करना यज्ञ है। जो विद्वान् को परम-ऐश्वर्य प्रदान करता है। विद्वान् उसके लिए वाणी (विद्या) का उपदेश करता है। विद्यादान यज्ञ है।
ईश्वर की इस सृष्टि में विद्वानों के समान सब मनुष्य मन्त्रोक्त यज्ञानुष्ठान से सब सुखों को प्राप्त करें ॥ ५ । २२ ।।